मऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़े राजनीतिक बदलाव की अटकलें तेज हो गई हैं। मऊ से लेकर लखनऊ तक इस बात की चर्चा है कि मऊ सदर से विधायक अब्बास अंसारी और अंसारी परिवार के कुछ सदस्य समाजवादी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक न तो अंसारी परिवार की ओर से कोई आधिकारिक बयान आया है और न ही समाजवादी पार्टी ने इसकी पुष्टि की है। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं और सूत्रों के दावों के चलते इस पूरे घटनाक्रम पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि अगले 24 घंटों में स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।

Abbas | Source: Pinterest

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मऊ से लेकर लखनऊ तक चर्चाओं का बाजार गर्म

मऊ की राजनीति में अंसारी परिवार का लंबे समय से प्रभाव रहा है। दिवंगत नेता मुख्तार अंसारी के निधन के बाद परिवार की राजनीतिक दिशा को लेकर लगातार कयास लगाए जाते रहे हैं। ऐसे में यदि अंसारी परिवार समाजवादी पार्टी के साथ खुलकर खड़ा होता है तो इसका असर केवल मऊ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पूर्वांचल की राजनीति पर पड़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दल अपने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को मजबूत करने में जुटे हैं। इसी संदर्भ में अंसारी परिवार और समाजवादी पार्टी की संभावित नजदीकियों को देखा जा रहा है।

सुभासपा के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है फैसला

अब्बास अंसारी वर्तमान में सुहेलदेव समाज पार्टी (सुभासपा) के टिकट पर विधायक हैं। पार्टी प्रमुख ओमप्रकाश राजभर कई मौकों पर उनके समर्थन में खुलकर सामने आते रहे हैं। ऐसे में यदि अब्बास अंसारी या उनके परिवार के सदस्य समाजवादी पार्टी में शामिल होते हैं तो इसे सुभासपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा। खासकर उस समय, जब ओमप्रकाश राजभर और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच जुबानी जंग लगातार तेज होती जा रही है। हाल के दिनों में दोनों नेताओं के बीच सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर भी तीखी बयानबाजी देखने को मिली है।

पूर्वांचल के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मऊ, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़ और आसपास के जिलों में अंसारी परिवार का प्रभाव माना जाता है। ऐसे में यदि यह संभावित राजनीतिक बदलाव होता है तो पूर्वांचल में विपक्षी राजनीति को नई ताकत मिल सकती है। वहीं सुभासपा को अपने संगठन और वोट बैंक को संभालने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ सकते हैं। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अंसारी परिवार आगे क्या राजनीतिक फैसला लेता है और क्या यह चर्चा वास्तविकता में बदलती है या फिर केवल राजनीतिक अटकल बनकर रह जाती है।