नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से सामने आई एक प्रेरक कहानी पूरे देश का ध्यान आकर्षित कर रही है। यह कहानी किसी एक युवा अधिकारी की सफलता भर नहीं, बल्कि उस परिवार की है जिसने लगभग 80 वर्षों से लगातार भारतीय सेना को अपने सपूत दिए हैं। परदादा से शुरू हुई देशसेवा की परंपरा अब चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है और लेफ्टिनेंट युवराज सिंह नुघाल ने वर्दी पहनकर इस गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाया है।
भारतीय सैन्य अकादमी के अनुसार युवराज सिंह नुघाल का कमीशन होना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि साहस, अनुशासन, सम्मान और राष्ट्रभक्ति से जुड़ी उस पारिवारिक परंपरा का नया अध्याय है, जिसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी देश की रक्षा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य माना।
आईएमए से निकले नए अधिकारी ने रचा पारिवारिक इतिहास
लेफ्टिनेंट युवराज सिंह नुघाल भारतीय सेना में अधिकारी बनने वाले अपने परिवार की चौथी पीढ़ी हैं। आईएमए से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें भारतीय सेना में कमीशन मिला और इसी के साथ उनके परिवार की दशकों पुरानी सैन्य परंपरा ने एक नया मुकाम हासिल किया।
सेना में शामिल होने के बाद युवराज अब केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित कर्तव्य और सम्मान की विरासत के नए संरक्षक बन गए हैं।
हिमाचल के प्रतिष्ठित विद्यालय से मिली नेतृत्व की पहली सीख
युवराज सिंह नुघाल ने हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध लॉरेंस स्कूल, सनावर से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। वर्ष 2020 बैच के छात्र रहे युवराज विद्यालय के हेड बॉय भी रहे थे।
शैक्षणिक उत्कृष्टता, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें प्रेसीडेंट मेडल से सम्मानित किया गया। छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्व और जिम्मेदारी की भावना स्पष्ट दिखाई देने लगी थी, जिसने आगे चलकर उन्हें सैन्य जीवन के लिए तैयार किया।
पिता बने सबसे बड़ी प्रेरणा, बचपन से देखा वर्दी का सम्मान
युवराज के पिता भारतीय सेना की 7 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री में अधिकारी रहे हैं। सैन्य जीवन के दौरान उन्होंने नेतृत्व, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया।
पिता की कार्यशैली और राष्ट्रसेवा के प्रति उनका समर्पण युवराज के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव छोड़ गया। बचपन से ही सेना का वातावरण देखने के कारण उनके भीतर देश की रक्षा करने का सपना मजबूत होता चला गया।
दादा ने 16 ग्रेनेडियर्स में निभाई वीरता की जिम्मेदारी
युवराज के दादा ने भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 16 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में सेवा दी थी। यह रेजिमेंट अपने साहस और अदम्य वीरता के लिए जानी जाती है।
दादा के सैन्य अनुभव, युद्धक्षेत्र की कहानियां और कर्तव्यनिष्ठा ने युवराज को बचपन से प्रेरित किया। परिवार में सेना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि सम्मान और जिम्मेदारी की पहचान रही है।
परदादा ने आजादी से पहले रखी थी देशभक्ति की नींव
इस प्रेरक यात्रा की शुरुआत भारत की आजादी से पहले हुई थी। लगभग 80 वर्ष पूर्व युवराज के परदादा ने भारतीय सेना की 7 जाट रेजिमेंट में सेवा देकर परिवार में देशभक्ति की वह नींव रखी, जो आज भी अटूट बनी हुई है।
उन्होंने उस दौर में राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए कर्तव्य का निर्वहन किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा आदर्श स्थापित किया, जिसे परिवार ने लगातार निभाया।
चार पीढ़ियों की विरासत बनी युवाओं के लिए प्रेरणा
लेफ्टिनेंट युवराज सिंह नुघाल की कहानी यह साबित करती है कि देशसेवा केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि संस्कार भी हो सकती है। परदादा, दादा और पिता के बाद अब युवराज ने भारतीय सेना की वर्दी पहनकर परिवार की गौरवशाली परंपरा को नई पहचान दी है।
उनकी यह उपलब्धि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रभक्ति के साथ भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा करने का सपना देखते हैं।
