
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है, और समाजवादी पार्टी के भीतर एक अलग ही हलचल दिख रही है। पार्टी के कई दिग्गज नेता अब अपनी सियासी विरासत अगली पीढ़ी को सौंपने की तैयारी में जुट गए हैं। करीब एक दर्जन से ज्यादा नेता अपने बेटे-बेटियों के लिए टिकट की दावेदारी पेश कर चुके हैं और इसके लिए ज़मीन पर माहौल भी बनाया जा रहा है।
इन नेताओं ने बीते महीनों में पार्टी नेतृत्व से मुलाकात कर अपनी बात रखी है। कई जगहों पर तो यह साफ दिखने लगा है कि पिता के साथ-साथ अब बेटा या बेटी भी क्षेत्र में सक्रिय हो चुके हैं, जनसंपर्क कर रहे हैं और चुनावी समीकरण साधने में जुटे हैं।
अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद अपने बेटे अजीत प्रसाद को मिल्कीपुर सीट से स्थापित करना चाहते हैं। हालांकि 2025 के उपचुनाव में अजीत को हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद अवधेश प्रसाद अपने फैसले पर कायम हैं और बेटे को ही आगे बढ़ाने में लगे हैं।
बाराबंकी की राजनीति में भी विरासत की यही कहानी दिखती है। बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा अब अपनी बेटी श्रेया वर्मा को आगे लाने की तैयारी में हैं। वहीं रामनगर सीट से विधायक फरीद महफूज किदवई अपने बेटे फैजान किदवई को चुनावी मैदान में उतारना चाहते हैं।
अंबेडकरनगर से सांसद लालजी वर्मा भी अपनी बेटी छाया वर्मा को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। छाया पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन अब उन्हें विधानसभा की राजनीति में लाने की रणनीति बनाई जा रही है।
आजमगढ़ में लंबे समय तक विधायक रहे दुर्गा प्रसाद यादव अपनी पारंपरिक सीट बेटे विजय यादव को सौंप सकते हैं। इसी तरह अंबिका चौधरी अपने बेटे आनंद चौधरी को आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं, जबकि निजामाबाद से आलम बदी अपने बेटे मुज्तेबा आलम को राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं।
संभल से विधायक नवाब इकबाल महमूद भी अपने बेटे सुहैल इकबाल महमूद को 2027 के चुनाव के लिए तैयार कर रहे हैं। वहीं बांसडीह सीट से रामगोविंद चौधरी अपने बेटे को राजनीतिक विरासत सौंपने के इच्छुक हैं।
पूर्व सांसद तूफानी सरोज भी पीछे नहीं हैं। उनकी बेटी प्रिया सरोज पहले से ही राजनीति में सक्रिय हैं, अब वे अपने बेटे धनंजय को भी सियासत में उतारने की तैयारी कर रहे हैं।
इन सभी घटनाओं से साफ है कि समाजवादी पार्टी के भीतर अब “नई पीढ़ी” को आगे लाने की एक संगठित कोशिश चल रही है। हालांकि यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह बदलाव है या फिर पारिवारिक राजनीति की एक और परत?
2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी जमीन पर जो हलचल दिख रही है, उससे इतना तय है कि इस बार मुकाबला सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि विरासत और प्रदर्शन के बीच
भी होगा।
