बिहार की राजनीति में एक बार फिर चुनावी हलचल तेज होने जा रही है। बिहार विधान परिषद की 9 सीटों पर चुनाव और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली हुई सीट पर उपचुनाव का ऐलान कर दिया गया है। पहली नजर में यह एक सामान्य चुनावी प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन बिहार की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि विधान परिषद की सीटों के चुनाव सिर्फ सदन की संख्या बढ़ाने-घटाने की कवायद नहीं होते, बल्कि ये सत्ता संतुलन, गठबंधन की मजबूती और भविष्य की राजनीतिक रणनीति का भी संकेत देते हैं। खासकर तब, जब राज्य अगले बड़े राजनीतिक समीकरणों की ओर बढ़ रहा हो।चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के मुताबिक 1 जून 2026 को अधिसूचना जारी होगी। उम्मीदवार 8 जून तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे, जबकि 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच होगी। उम्मीदवारों के पास 11 जून तक नाम वापस लेने का समय रहेगा। मतदान 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक कराया जाएगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना भी शुरू होगी। आयोग ने कहा है कि 20 जून 2026 तक पूरी चुनाव प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
नीतीश कुमार की सीट पर क्यों हो रहा है उपचुनाव?
इन चुनावों की चर्चा सिर्फ 9 सीटों तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक और सीट पर उपचुनाव होगा, जो राजनीतिक रूप से काफी अहम मानी जा रही है। यह सीट पहले नीतीश कुमार के पास थी। लेकिन उनके राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट खाली हो गई, जिसके चलते अब यहां उपचुनाव कराया जा रहा है। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि लंबे समय से सत्ता संतुलन का केंद्र रहे हैं। ऐसे में उनकी खाली हुई सीट पर होने वाला उपचुनाव भी राजनीतिक रूप से प्रतीकात्मक महत्व रखता है। राजनीतिक दल इस सीट को सिर्फ संख्या के तौर पर नहीं, बल्कि अपने प्रभाव के संकेत के रूप में भी देख रहे हैं।
10 सीटें, लेकिन मुकाबला कितना कठिन होगा?
इन चुनावों में कुल 10 सीटों पर मतदान होना है। इनमें से फिलहाल 5 सीटें जेडीयू, 2 सीटें बीजेपी, 2 सीटें आरजेडी और 1 सीट कांग्रेस के पास है। यानी सीटों का मौजूदा गणित पहले से काफी कुछ संकेत देता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधान परिषद चुनावों में विधानसभा का संख्याबल बड़ी भूमिका निभाता है। यहां आम जनता सीधे वोट नहीं करती, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए चुनाव होता है। इसलिए सदन में जिस गठबंधन के पास संख्या ज्यादा होती है, उसकी स्थिति स्वाभाविक रूप से मजबूत मानी जाती है। यही वजह है कि मौजूदा राजनीतिक हालात में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बढ़त में माना जा रहा है। 2025 के विधानसभा चुनावों में एनडीए को मिली बड़ी जीत के बाद उसका संख्याबल मजबूत हुआ है और इसका असर विधान परिषद चुनाव में भी दिखाई दे सकता है।
कौन-कौन से नेताओं का कार्यकाल हो रहा खत्म?
28 जून को जिन नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनमें कई बड़े नाम शामिल हैं। इनमें गुलाम गौस, कुमुद वर्मा, मोहम्मद फारुख, भगवान सिंह कुशवाहा, भीष्म साहनी, संजय मयूख, समीर कुमार सिंह, सम्राट चौधरी और सुनील कुमार सिंह के नाम शामिल हैं।.इन नेताओं के कार्यकाल पूरा होने के बाद नई नियुक्तियां सिर्फ सीटों की अदला-बदली नहीं होंगी, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि पार्टियां किन चेहरों पर भरोसा करती हैं। क्या पुराने नेताओं को दोबारा मौका मिलेगा या नए चेहरों को आगे लाया जाएगा, यह भी चुनाव की बड़ी कहानी बन सकती है।
क्या नतीजे पहले से तय माने जा रहे हैं?
बिहार की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि विधान परिषद चुनाव का गणित सड़क की राजनीति से कम और सदन की राजनीति से ज्यादा तय होता है। विधानसभा में मौजूदा संख्याबल को देखते हुए कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजों की दिशा काफी हद तक पहले से साफ दिखाई दे रही है। लेकिन बिहार की राजनीति की खासियत यही रही है कि यहां अंतिम समय तक समीकरण बदलने की संभावना बनी रहती है। इसलिए अब निगाहें सिर्फ तारीखों पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की सूची पर भी टिकी हैं। क्योंकि कई बार चुनाव की असली कहानी मतदान के दिन नहीं, टिकट बंटवारे के दिन शुरू होती है।
