
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस पार्टी में समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। पार्टी के भीतर दो गुट बन गए हैं। एक गुट सपा के साथ गठबंधन जारी रखने के पक्ष में है, जबकि दूसरा गुट चाहता है कि कांग्रेस अकेले चुनाव लड़े।
गठबंधन के पक्ष में क्या तर्क हैं?
गठबंधन का समर्थन करने वाले नेताओं का कहना है कि सपा के साथ रहने से कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। उनका मानना है कि विधानसभा में कांग्रेस की संख्या बढ़ेगी तो पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत कर पाएगी। साथ ही, अगर इंडिया गठबंधन की सरकार बनती है तो कांग्रेस को संगठन मजबूत करने का मौका मिलेगा।
गठबंधन के खिलाफ क्या तर्क हैं?
दूसरे गुट का कहना है कि गठबंधन से कुछ सीटें तो मिल सकती हैं, लेकिन कांग्रेस का अपना जनाधार मजबूत नहीं होगा। उनका मानना है कि पार्टी को ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने चाहिए, तभी संगठन मजबूत होगा और जनता के बीच पार्टी की पहचान बढ़ेगी।
बीजेपी को सीधी चुनौती देने की मांग
गठबंधन का विरोध करने वाले नेताओं का मानना है कि कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ सीधे मुकाबले में उतरना चाहिए। उनका कहना है कि इससे पार्टी नए वोटरों को जोड़ सकेगी और अपना अलग वोट बैंक तैयार कर पाएगी। पार्टी महिलाओं, ब्राह्मणों, मुसलमानों और पिछड़े वर्गों को साथ लाने की रणनीति पर भी विचार कर रही है।
पहले भी हो चुका है गठबंधन
सपा और कांग्रेस ने 2017 विधानसभा चुनाव में साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय दोनों दलों ने “यूपी को ये साथ पसंद है” नारे के साथ चुनाव प्रचार किया था, लेकिन गठबंधन को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों की साझेदारी को फायदा हुआ। सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए पहले के मुकाबले काफी सीटें गंवा बैठा।
आगे क्या होगा?
सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार गठबंधन बनाए रखने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि सीटों से ज्यादा जरूरी जीत है। वहीं कांग्रेस के कुछ नेता गठबंधन पर खुलकर समर्थन नहीं दे रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एनडीए का मुकाबला इंडिया गठबंधन से होगा या फिर सपा और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ेंग
