नई दिल्ली:
नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में किसानों के हित में बड़ा फैसला लिया गया है। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति यानी CCEA ने वर्ष 2026-27 के लिए 14 खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। सरकार का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाना, कृषि क्षेत्र को मजबूत करना और खेती को अधिक लाभकारी बनाना है।

सरकार द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक, इस बार MSP में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सूरजमुखी के बीज पर की गई है। सूरजमुखी के MSP में ₹622 प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। इसके बाद कपास में ₹557 प्रति क्विंटल, नाइजरसीड में ₹515 प्रति क्विंटल और दूसरी श्रेणी के कपास में करीब ₹500 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी को मंजूरी मिली है। सरकार का कहना है कि किसानों की लागत, उत्पादन खर्च, बाजार की स्थिति और कृषि क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया है।
खरीफ फसलें भारत की कृषि व्यवस्था का अहम हिस्सा मानी जाती हैं। इन फसलों की बुवाई मानसून के दौरान होती है और कटाई अक्टूबर-नवंबर के आसपास की जाती है। धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, अरहर, उड़द, मूंग, सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी और कपास जैसी फसलें खरीफ सीजन में उगाई जाती हैं। MSP बढ़ने से किसानों को अपनी फसल बेचते समय न्यूनतम कीमत की गारंटी मिलती है, जिससे बाजार में कीमत गिरने का असर कम होता है।
कृषि मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सरकार लगातार किसानों की आय बढ़ाने पर फोकस कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में MSP में लगातार बढ़ोतरी की गई है ताकि किसानों को खेती में बेहतर लाभ मिल सके। सरकार का यह भी मानना है कि MSP बढ़ाने से किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ दलहन और तिलहन की खेती की ओर भी आकर्षित होंगे।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सूरजमुखी और नाइजरसीड जैसी तिलहन फसलों के MSP में बड़ी बढ़ोतरी का उद्देश्य खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना भी है। भारत लंबे समय से खाद्य तेलों के आयात पर निर्भर रहा है। ऐसे में सरकार चाहती है कि किसान ज्यादा से ज्यादा तिलहन फसलें उगाएं ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।
कपास के MSP में हुई बढ़ोतरी को भी अहम माना जा रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में किसान कपास की खेती करते हैं। किसानों का कहना है कि डीजल, खाद, बीज और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है, ऐसे में MSP में बढ़ोतरी से उन्हें कुछ राहत जरूर मिलेगी।
हालांकि कई कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ MSP बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि किसानों को वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब सरकारी खरीद व्यवस्था मजबूत होगी। कई राज्यों में किसान आज भी MSP से कम कीमत पर अपनी फसल बेचने को मजबूर होते हैं क्योंकि खरीद केंद्रों की संख्या कम होती है या समय पर खरीद नहीं हो पाती।
किसान संगठनों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही MSP की कानूनी गारंटी की मांग भी दोहराई है। उनका कहना है कि MSP घोषित होने के बावजूद हर किसान तक उसका लाभ नहीं पहुंच पाता। छोटे और सीमांत किसानों को कई बार बिचौलियों के कारण कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है।
विपक्षी दलों ने भी इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी है। कुछ नेताओं ने MSP बढ़ोतरी का स्वागत किया, जबकि कुछ का कहना है कि बढ़ती महंगाई और खेती की लागत को देखते हुए किसानों को और ज्यादा राहत की जरूरत थी। विपक्ष का यह भी कहना है कि MSP बढ़ाने के साथ-साथ सरकार को खरीद प्रक्रिया और भुगतान व्यवस्था में भी सुधार करना चाहिए।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि MSP में बढ़ोतरी का असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। किसानों की आमदनी बढ़ने से गांवों में खर्च बढ़ता है, जिससे स्थानीय बाजारों और छोटे कारोबारों को भी फायदा मिलता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, किसानों से जुड़े फैसले हमेशा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे समय में जब कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा हो रही है, MSP बढ़ाने के फैसले को सरकार के बड़े किसान हितैषी कदम के रूप में देखा जा रहा है।
फिलहाल किसानों की नजर इस बात पर रहेगी कि नई MSP दरें जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू होती हैं और सरकारी खरीद व्यवस्था कितनी मजबूत रहती है। आने वाले खरीफ सीजन में यह फैसला किसानों के लिए कितनी राहत लेकर आता है, यह देखने वाली बात होगी।
