नई दिल्ली:

थैलेसीमिया एक ऐसी आनुवंशिक बीमारी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों में फैलती है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में यह बीमारी तेजी से चिंता का विषय बनती जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार, कुछ खास देशों और क्षेत्रों के लोगों में थैलेसीमिया का खतरा ज्यादा पाया जाता है और इसके पीछे आनुवंशिक के साथ-साथ भौगोलिक कारण भी जिम्मेदार हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि थैलेसीमिया मुख्य रूप से भूमध्यसागरीय (Mediterranean), दक्षिण एशियाई, मध्य पूर्व और अफ्रीकी देशों में ज्यादा देखा जाता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, सऊदी अरब, ग्रीस, इटली और कुछ अफ्रीकी देशों में इसके मामले अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं। भारत में भी कुछ समुदायों और क्षेत्रों में इसका जोखिम ज्यादा माना जाता है।

डॉक्टर बताते हैं कि यह बीमारी तब होती है जब शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जो शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। जब इसकी कमी होती है, तो व्यक्ति को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन क्षेत्रों में पहले मलेरिया का खतरा ज्यादा था, वहां थैलेसीमिया जीन अधिक पाया जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह जीन कभी मलेरिया से आंशिक सुरक्षा देने में मदद करता था, इसलिए समय के साथ यह उन क्षेत्रों की आबादी में ज्यादा फैल गया।

भारत में हर साल हजारों बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता की कमी और शादी से पहले जांच न कराना इसके बढ़ते मामलों की बड़ी वजह है। अगर दो थैलेसीमिया कैरियर आपस में शादी करते हैं, तो उनके बच्चे में यह बीमारी गंभीर रूप में हो सकती है।

डॉक्टरों ने सलाह दी है कि शादी से पहले थैलेसीमिया स्क्रीनिंग जरूर करानी चाहिए। इससे यह पता चल सकता है कि व्यक्ति इस बीमारी का कैरियर है या नहीं। समय रहते जांच कराने से आने वाली पीढ़ियों को इस बीमारी से बचाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ग्रामीण और कम जागरूकता वाले इलाकों में अभी भी लोग इस बीमारी के बारे में ज्यादा नहीं जानते। कई परिवार तब तक जांच नहीं कराते, जब तक बच्चे में गंभीर लक्षण दिखाई नहीं देने लगते।

सरकार और स्वास्थ्य संस्थाएं लगातार जागरूकता अभियान चला रही हैं, लेकिन अभी भी बड़े स्तर पर काम किए जाने की जरूरत है। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग और जागरूकता कार्यक्रम बढ़ाने की मांग की जा रही है।

कुल मिलाकर, थैलेसीमिया सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती भी है। सही समय पर जांच, जागरूकता और सावधानी के जरिए इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।