ज़की अख़्तर:

करीब डेढ़ हजार साल पहले जब दुनिया के अधिकांश देशों में आधुनिक राज्यों की कल्पना भी नहीं की गई थी, तब जापान में एक ऐसी कंपनी की नींव रखी गई जो आज भी अस्तित्व में है। यह कहानी है कोंगो गुमी (Kongo Gumi) की, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी लगातार चलने वाली कंपनी माना जाता है। वर्ष 578 ईस्वी में स्थापित इस कंपनी ने साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा, युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया, आर्थिक संकट झेले, लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व को बचाए रखा। सवाल यह है कि आखिर कौन-सी ताकत थी जिसने इस कंपनी को 1400 साल से अधिक समय तक जीवित रखा?1400 साल पुरानी कोंगो गुमी कंपनी

1400 साल पुरानी कोंगो गुमी कंपनी

बौद्ध मंदिरों से शुरू हुई थी 14 सदियों पुरानी यात्रा

कोंगो गुमी की शुरुआत एक कोरियाई शिल्पकार शिगेमित्सु कोंगो ने की थी, जिन्हें जापान के शाही परिवार ने बौद्ध मंदिरों के निर्माण के लिए आमंत्रित किया था। कंपनी का पहला बड़ा प्रोजेक्ट ओसाका का प्रसिद्ध शितेन्नो-जी मंदिर था, जिसे जापान के सबसे पुराने बौद्ध मंदिरों में गिना जाता है। इसके बाद कोंगो गुमी ने मंदिरों, महलों और धार्मिक संरचनाओं के निर्माण में ऐसी विशेषज्ञता हासिल की कि उसका नाम गुणवत्ता और पारंपरिक वास्तुकला का पर्याय बन गया। सदियों तक कंपनी की पहचान मंदिर निर्माण और संरक्षण से जुड़ी रही और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी बनी।

युद्ध आया तो ताबूत बनाए, भूकंप आए तो तकनीक बदली

कोंगो गुमी की सबसे बड़ी खासियत उसका समय के साथ खुद को ढाल लेना रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब मंदिर निर्माण की मांग कम हो गई, तब कंपनी ने अपने कारीगरों को बेरोजगार होने से बचाने के लिए ताबूत बनाने का काम शुरू कर दिया। युद्ध के बाद जापान में आए बड़े भूकंपों ने पारंपरिक निर्माण तकनीकों को चुनौती दी, तो कंपनी ने आधुनिक कंक्रीट तकनीक को अपनाया। हालांकि उसने अपनी पारंपरिक लकड़ी और मिट्टी आधारित निर्माण कला को कभी नहीं छोड़ा। यही संतुलन-परंपरा और आधुनिकता का मेल-उसे प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने का आधार बना।

परिवार की कंपनी, लेकिन उत्तराधिकारी योग्यता से चुना जाता था

कोंगो गुमी का एक और अनोखा मॉडल था, जिसने उसे सदियों तक मजबूत बनाए रखा। यहां नेतृत्व हमेशा परिवार के भीतर रहा, लेकिन उत्तराधिकारी चुनने का आधार सिर्फ जन्म नहीं बल्कि योग्यता थी। यदि परिवार में कोई सक्षम पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता था, तो दामाद को परिवार का हिस्सा बनाकर कंपनी की जिम्मेदारी सौंप दी जाती थी। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी की 38वीं प्रमुख एक महिला थीं। इस व्यवस्था ने सुनिश्चित किया कि नेतृत्व हमेशा सक्षम हाथों में रहे। वहीं कंपनी के बढ़ई और कारीगर वर्षों की कठोर ट्रेनिंग के बाद ही स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति पाते थे, जिससे गुणवत्ता कभी प्रभावित नहीं हुई।

2006 में आई सबसे बड़ी चुनौती, फिर भी बच गया 1400 साल पुराना नाम

इतने लंबे इतिहास के बावजूद कोंगो गुमी पूरी तरह अजेय नहीं रही। आर्थिक मंदी, मंदिर निर्माण में कमी और बढ़ते खर्चों ने 21वीं सदी की शुरुआत में कंपनी को गंभीर संकट में डाल दिया। वर्ष 2006 में हालात इतने खराब हो गए कि दिवालिया होने का खतरा पैदा हो गया। तब जापान की बड़ी निर्माण कंपनी ताकामात्सु कंस्ट्रक्शन ग्रुप ने इसे खरीद लिया। हालांकि कोंगो गुमी का नाम और उसकी पहचान बरकरार रखी गई। आज यह उसी समूह की सहायक कंपनी के रूप में काम करती है और अब भी उसकी आय का बड़ा हिस्सा मंदिर निर्माण और ऐतिहासिक इमारतों के जीर्णोद्धार से आता है। हाल के वर्षों में कंपनी ने अमेरिका, चीन और संयुक्त अरब अमीरात तक अपने प्रोजेक्ट्स का विस्तार किया है, लेकिन उसकी आत्मा आज भी जापान की पारंपरिक वास्तुकला में बसती है।