गया। बिहार के गयाजी में लगने वाला विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला सिर्फ पिंडदान और तर्पण के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां सदियों से चली आ रही कई धार्मिक परंपराएं भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। इन्हीं परंपराओं में एक ऐसी मान्यता शामिल है, जिसके तहत पिंडदानी अक्षयवट वेदी के सामने अपने पसंदीदा किसी एक फल को जीवनभर न खाने की सौगंध लेते हैं। यह परंपरा पितृपक्ष के अंतिम दिन निभाई जाती है और इसे पिंडदान की महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है।
इस वर्ष पितृपक्ष मेले का समापन 10 अक्टूबर को होगा। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी श्रद्धालु गयाजी पहुंचकर अपने पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं। पितृपक्ष के अंतिम दिन अक्षयवट वेदी पर होने वाली यह विशेष परंपरा भी श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय रहती है।
अक्षयवट के सामने लेते हैं जीवनभर फल त्यागने की प्रतिज्ञा
गयाजी की इस परंपरा में पिंडदानी अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए किसी एक फल को जीवनभर के लिए छोड़ने का संकल्प ले सकता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार पंडा श्रद्धालु से यह संकल्प करवाते हैं।
इस दौरान श्रद्धालु अपनी प्रतिज्ञा के रूप में यह कहते हैं कि वह अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए अमुक फल का जीवनभर त्याग करेंगे। एक बार संकल्प लेने के बाद संबंधित व्यक्ति उस फल को अपने जीवन में नहीं खाने की प्रतिज्ञा करता है।
यह परंपरा सभी पिंडदानियों के लिए अनिवार्य नहीं है। श्रद्धालु अपनी आस्था और इच्छा के अनुसार यह संकल्प ले सकता है। बताया जाता है कि कई पिंडदानी पितृपक्ष के अंतिम दिन अक्षयवट वेदी पर यह प्रतिज्ञा लेकर ही अपने धार्मिक अनुष्ठान को पूरा मानते हैं।
पितृपक्ष के अंतिम दिन ही क्यों निभाई जाती है यह परंपरा?
गयाजी में पितृपक्ष के दौरान अलग-अलग वेदियों पर पिंडदान और तर्पण की धार्मिक प्रक्रिया होती है। पितृश्राद्ध के अंतिम चरण में अक्षयवट वेदी का विशेष महत्व माना जाता है। इसी कारण अंतिम दिन बड़ी संख्या में पिंडदानी अक्षयवट के पास पहुंचते हैं।
इसी धार्मिक अवसर पर श्रद्धालु अपनी इच्छा से किसी फल का त्याग करने का संकल्प ले सकते हैं। मान्यता के अनुसार श्रद्धालु को अपने पसंदीदा फल को इस संकल्प में शामिल करना चाहिए। हालांकि व्यवहार में बड़ी संख्या में लोग शरीफा फल का त्याग करने की प्रतिज्ञा लेते हैं।
इस संकल्प का उद्देश्य श्रद्धालु की व्यक्तिगत आस्था और पितरों के प्रति समर्पण से जुड़ा माना जाता है। यह किसी सरकारी या अनिवार्य धार्मिक नियम के रूप में लागू नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपरा है।
आखिर क्या है अक्षयवट वेदी?
गयाजी में स्थित अक्षयवट को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। अक्षयवट का अर्थ ही ऐसे वट वृक्ष से जो कभी क्षय न हो। इस वृक्ष की वास्तविक आयु के बारे में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन कथाओं में इसका उल्लेख लंबे समय से मिलता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार अक्षयवट को माता सीता से जुड़ा विशेष आशीर्वाद प्राप्त है। कहा जाता है कि माता सीता ने इस वट वृक्ष को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का आशीर्वाद दिया था। साथ ही इसके कभी क्षय न होने का वरदान भी दिया गया।
इसी धार्मिक मान्यता के कारण गयाजी में अक्षयवट को पिंडदान और पितृश्राद्ध की परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।
माता सीता ने अक्षयवट को क्यों दिया था वरदान?
अक्षयवट से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान श्रीराम, माता सीता और राजा दशरथ के पिंडदान से संबंधित है। धार्मिक कथा के अनुसार जब भगवान श्रीराम वनवास में थे, उसी दौरान उन्हें अपने पिता राजा दशरथ के निधन का समाचार मिला।
कथा के अनुसार भगवान श्रीराम और लक्ष्मण पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने के उद्देश्य से वहां से चले गए। इसी दौरान माता सीता के सामने राजा दशरथ की आत्मा के पिंडदान की आवश्यकता का प्रसंग आया।
मान्यता के अनुसार माता सीता ने फल्गु नदी के किनारे बालू से पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान किया। धार्मिक कथा में यह भी कहा गया है कि राजा दशरथ की आत्मा ने उस पिंड को स्वीकार किया।
जब श्रीराम ने मांगा पिंडदान का प्रमाण
पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीराम और लक्ष्मण वापस लौटे तो उन्हें जानकारी मिली कि माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया है। इसके बाद पिंडदान के प्रमाण को लेकर सवाल उठा।
कहा जाता है कि माता सीता ने अपने पिंडदान की सच्चाई की पुष्टि के लिए वहां मौजूद कुछ तत्वों को साक्षी बनाया। इनमें गौ, ब्राह्मण, तुलसी, फल्गु नदी और अक्षयवट का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक कथा के अनुसार इनमें से अधिकांश ने माता सीता के पक्ष में गवाही नहीं दी, लेकिन अक्षयवट ने श्रीराम के सामने सत्य की पुष्टि की। इसी कारण माता सीता ने अक्षयवट को आशीर्वाद दिया।
अक्षयवट को मिला अमर रहने का आशीर्वाद, फल्गु नदी को श्राप की मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता सीता अक्षयवट की सत्य गवाही से प्रसन्न हुईं और उन्होंने उसे कभी नष्ट न होने का आशीर्वाद दिया। इसी वजह से इसे ‘अक्षयवट’ कहा गया।
इसी कथा में यह भी बताया जाता है कि फल्गु नदी ने माता सीता का साथ नहीं दिया, जिसके कारण उन्हें माता सीता के श्राप का सामना करना पड़ा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी श्राप के कारण फल्गु नदी का एक बड़ा हिस्सा ऊपर से सूखा दिखाई देता है, जबकि उसके नीचे जलधारा मौजूद रहती है।
यह पूरी कथा धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है, जिसका गयाजी की पिंडदान परंपरा में विशेष स्थान है।
देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु
पितृपक्ष के दौरान गयाजी में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों का श्राद्ध और पिंडदान करने पहुंचते हैं। विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय भी अपने पितरों के लिए यहां धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
गयाजी का पितृपक्ष मेला इसी वजह से देश के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल माना जाता है। पिंडदान की अलग-अलग परंपराओं के बीच अक्षयवट वेदी पर फल त्यागने का संकल्प एक ऐसी रस्म है, जिसे श्रद्धालु अपनी आस्था और विश्वास के अनुसार निभाते हैं।
हर श्रद्धालु के लिए जरूरी नहीं है फल त्यागने की सौगंध
अक्षयवट वेदी पर फल का जीवनभर त्याग करने की परंपरा के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे हर पिंडदानी के लिए अनिवार्य नहीं बताया गया है। श्रद्धालु अपनी इच्छा और आस्था के अनुसार यह संकल्प ले सकता है।
कई श्रद्धालु इसे पितरों के प्रति अपने समर्पण और धार्मिक संकल्प के रूप में देखते हैं। पसंदीदा फल का त्याग जीवनभर के लिए करने की प्रतिज्ञा इस परंपरा को अन्य पिंडदान विधियों से अलग और विशिष्ट बनाती है।
10 अक्टूबर को पितृपक्ष मेले का होगा समापन
गयाजी में इस वर्ष का पितृपक्ष मेला 10 अक्टूबर को समाप्त होगा। मेले के अंतिम चरण में बड़ी संख्या में पिंडदानी अपने पितरों के लिए अंतिम धार्मिक कर्मकांड पूरा करने अक्षयवट वेदी पहुंचेंगे।
यहीं कई श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार किसी एक फल को जीवनभर न खाने का संकल्प भी लेंगे। इस परंपरा के पीछे अक्षयवट से जुड़ी पौराणिक कथा और पितरों के प्रति श्रद्धा की भावना को महत्वपूर्ण माना जाता है।
