नई दिल्ली। भारतीय कॉरपोरेट जगत में इन दिनों बॉन्ड के जरिए बड़ी रकम जुटाने की गतिविधियां तेज हो गई हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स, एसआईडीबीआई, आदित्य बिड़ला कैपिटल और जेएसडब्ल्यू एनर्जी जैसी कंपनियां और संस्थाएं बाजार से हजारों करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी या प्रक्रिया में हैं। इस हलचल को 7 अक्टूबर को होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति घोषणा से पहले उपलब्ध फंडिंग और ब्याज दरों की परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
रिलायंस जुटाएगी 10,000 करोड़ रुपये, 10 साल का होगा बॉन्ड
रिलायंस इंडस्ट्रीज करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना पर काम कर रही है। रॉयटर्स के मुताबिक कंपनी 10 साल की अवधि वाले रुपये में जारी बॉन्ड के जरिए यह रकम जुटा सकती है और प्रस्तावित कूपन करीब 7.90 फीसदी बताया गया है। कंपनी अगले सप्ताह या उसके बाद निवेशकों से बोलियां मंगा सकती है।
खास बात यह है कि रिलायंस ने इससे कुछ समय पहले ही पांच साल की अवधि वाले बॉन्ड के जरिए करीब 12,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। उस इश्यू पर सालाना कूपन 7.47 फीसदी था। रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू बॉन्ड बाजार की स्थितियां फिलहाल अमेरिकी डॉलर में कर्ज लेने की तुलना में कंपनियों के लिए आकर्षक हो सकती हैं।
अडानी एयरपोर्ट समेत कई कंपनियां भी बाजार में
रिलायंस अकेली कंपनी नहीं है जो बॉन्ड बाजार का रुख कर रही है। अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स करीब 1,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना में है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार तीन साल की अवधि वाले इस बॉन्ड पर करीब 8.96 फीसदी की दर बताई गई है। इसके अलावा एसआईडीबीआई करीब 6,000 करोड़ रुपये तक, आदित्य बिड़ला कैपिटल करीब 1,000 करोड़ रुपये और जेएसडब्ल्यू एनर्जी करीब 500 करोड़ रुपये जुटाने की प्रक्रिया में है।
इन प्रस्तावित सौदों को मिलाकर शुक्रवार को ही 14,500 करोड़ रुपये से अधिक की रकम जुटाने की गतिविधि सामने आई है। यह आंकड़ा बताता है कि कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में इस समय फंड जुटाने की गतिविधियां काफी बढ़ी हुई हैं।
7 अक्टूबर की तारीख पर क्यों टिकी है बाजार की नजर?
भारतीय रिजर्व बैंक की अगली मौद्रिक नीति घोषणा 7 अक्टूबर को होनी है। बाजार में इस बैठक को लेकर ब्याज दरों और लिक्विडिटी से जुड़े फैसलों पर नजर है। हाल के दिनों में भारतीय बॉन्ड यील्ड पर भी दबाव देखा गया है। 24 सितंबर को बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 7.1067 फीसदी तक पहुंच गई थी।
ऐसे माहौल में कुछ कंपनियां मौजूदा बाजार परिस्थितियों का फायदा उठाकर संभावित नीतिगत बदलाव से पहले अपनी फंडिंग जरूरतें पूरी करना चाहती हैं। रिलायंस के मामले में भी बैंकर्स ने रॉयटर्स को बताया कि कंपनी 7 अक्टूबर की मौद्रिक नीति घोषणा से पहले उधारी पूरी करना चाह सकती है।
बैंकों में अतिरिक्त नकदी भी बनी बड़ी वजह
कॉरपोरेट बॉन्ड में बढ़ती गतिविधि के पीछे बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी भी एक महत्वपूर्ण कारण बताई जा रही है। हाल में बैंकों में विदेशी मुद्रा प्रवाह और आरबीआई की विभिन्न लिक्विडिटी कार्रवाइयों के कारण उपलब्ध नकदी में बड़ा बदलाव आया है। सितंबर की शुरुआत में बैंकिंग सिस्टम में करीब 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अधिशेष बताया गया था।
बैंक इस अतिरिक्त फंड को कॉरपोरेट लोन, प्रोजेक्ट फाइनेंस और कॉरपोरेट बॉन्ड जैसे विकल्पों में लगाने की कोशिश कर सकते हैं। इसी वजह से अच्छी क्रेडिट प्रोफाइल वाली कंपनियों के लिए बॉन्ड बाजार से फंड जुटाने का अवसर बना हुआ है।
आरबीआई पहले ही लिक्विडिटी घटाने में जुटा
दूसरी ओर आरबीआई बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए कदम उठा रहा है। रॉयटर्स के अनुसार केंद्रीय बैंक ने हाल में बॉन्ड बिक्री और अन्य उपायों के जरिए सिस्टम की अतिरिक्त लिक्विडिटी में कमी की है। 22 सितंबर की रिपोर्ट में बैंकिंग सिस्टम का लिक्विडिटी सरप्लस घटकर करीब 4.92 लाख करोड़ रुपये बताए जाने की बात सामने आई थी।
इसका असर बॉन्ड यील्ड और उधारी की लागत पर पड़ सकता है। यही वजह है कि बाजार में कंपनियों की ओर से मौजूदा फंडिंग परिस्थितियों का इस्तेमाल करने की गतिविधि को लेकर चर्चा तेज है।
ब्याज दर बढ़ने की चर्चा के बीच कंपनियां क्यों कर रही हैं फंडिंग?
बाजार में 7 अक्टूबर की बैठक में रेपो रेट को लेकर बदलाव की संभावना पर चर्चा है। हालांकि अंतिम फैसला आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ही करेगी। हाल की रिपोर्टों में अगस्त की खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रहने, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर बाजार की चिंताओं का उल्लेख किया गया है।
ऐसे माहौल में कंपनियों के लिए बॉन्ड के जरिए पहले से फंड जुटाना भविष्य की उधारी लागत में संभावित बदलाव से बचाव का एक तरीका हो सकता है। हालांकि किसी कंपनी के लिए वास्तविक लागत और फंडिंग का फैसला बाजार की उस समय की परिस्थितियों, निवेशकों की मांग और बॉन्ड की शर्तों पर निर्भर करता है।
फिलहाल रिलायंस से लेकर अडानी एयरपोर्ट और अन्य बड़े उधारकर्ताओं की गतिविधियों ने कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को चर्चा में ला दिया है। अब 7 अक्टूबर को आरबीआई की मौद्रिक नीति घोषणा के बाद ब्याज दर और लिक्विडिटी को लेकर तस्वीर और स्पष्ट होगी।
