erer | Source: ereअमरावती / नई दिल्ली । "पिता का रिश्ता खून का नहीं, जिम्मेदारी और प्रेम से होता है।" इस महान सोच को अपनी जिंदगी का मकसद बनाने वाले पद्म श्री शंकर बाबा पापलकर आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले शंकर बाबा ने उन बेसहारा और दिव्यांग बच्चों को नई जिंदगी दी है, जिन्हें दुनिया ने सड़कों, मंदिरों या कूड़े के ढेरों में मरने के लिए छोड़ दिया था। 123 अनाथ बच्चों के कानूनी 'पिता' बन चुके शंकर बाबा की यह प्रेरणादायक कहानी हर किसी की आंखें नम कर देती है। आइए जानते हैं उनके संघर्ष और उपलब्धियों की पूरी दास्तान।

कौन हैं शंकर बाबा पापलकर?

शंकर बाबा पुंडलीकराव पापलकर महाराष्ट्र के अमरावती जिले से एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता (Social Worker) हैं। 14 फरवरी 1942 को जन्मे शंकर बाबा ने अपना पूरा जीवन अनाथ, मूक-बधिर और मानसिक व शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चों के कल्याण, पुनर्वास और उन्हें समाज में एक सम्मानित पहचान दिलाने के लिए समर्पित कर दिया है। उन्होंने साल 1990 में अमरावती के वझ्झर गांव की एक पहाड़ी पर अनाथालय की शुरुआत की थी।

123 बच्चों के कानूनी 'पिता', लड़ी लंबी कानूनी लड़ाई

शंकर बाबा ने न केवल अनाथ बच्चों की परवरिश की, बल्कि उन्हें अपना नाम भी दिया। उन्होंने 123 अनाथ और बेसहारा बच्चों के सरकारी दस्तावेजों और पहचान पत्रों पर पिता के रूप में अपना नाम (शंकर बाबा पापलकर) दर्ज कराया है।

सरकारी नियमों के मुताबिक अनाथालयों में बच्चे सिर्फ 18 साल की उम्र तक ही रह सकते हैं। लेकिन शंकर बाबा ने कड़ा विरोध करते हुए कहा था, "मेरा कोई भी बच्चा सड़कों पर भीख नहीं मांगेगा।" उन्होंने मानसिक और शारीरिक रूप से विशेष बच्चों के आजीवन पुनर्वास के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, ताकि 18 साल की उम्र के बाद उन्हें किसी भी तरह के शोषण का शिकार न होना पड़े।

कूड़ेदान से मिली दृष्टिबाधित माला ने पास की MPSC परीक्षा

शंकर बाबा के अनाथालय में पले-बढ़े 12 बच्चे आज सरकारी नौकरी हासिल कर देश की सेवा कर रहे हैं। इनमें जन्म से दृष्टिबाधित माला भी शामिल हैं, जिन्हें शंकर बाबा ने जलगांव रेलवे स्टेशन के एक कूड़ेदान से उठाया था।

शंकर बाबा ने माला को अपनी बेटी बनाया और उसकी ब्रेल लिपि से लेकर उच्च शिक्षा तक का पूरा ख्याल रखा। माला ने कड़ी मेहनत कर महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन (MPSC) की ग्रुप C परीक्षा पास की और अक्टूबर 2025 में नागपुर कलेक्ट्रेट में रेवेन्यू असिस्टेंट के पद पर नियुक्त हुईं। उनकी इस सफलता ने पूरे अनाथालय और देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

मिला पद्म श्री सम्मान, दिव्यांग बच्चों को किया समर्पित

समाज में उनके इस अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने साल 2024 में शंकर बाबा पापलकर को प्रतिष्ठित 'पद्म श्री' सम्मान से नवाजा। यह सम्मान मिलने के बाद उन्होंने कहा था, "मैं यह अवॉर्ड अपने दिव्यांग बच्चों को समर्पित करता हूं।" इसके अलावा जून 2026 में नागपुर यूनिवर्सिटी द्वारा भी विदर्भ के पद्म श्री विजेताओं के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें सम्मानित किया गया था। शंकर बाबा का यह सफर साबित करता है कि सच्ची मानवता और दृढ़ संकल्प से समाज की हर तस्वीर बदली जा सकती है।