सुप्रीम कोर्ट ने वाराणसी के ज्ञानवापी विवाद को सुलझाने की दिशा में अहम पहल करते हुए मामले को विशेष लोक अदालत के पास भेज दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों को बातचीत के जरिए आपसी सहमति से समाधान निकालने की सलाह दी है।Varanasi Gyanvapi Case: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, वाराणसी ज्ञानवापी विवाद विशेष लोक अदालत को भेजा; बातचीत से समझौते की दी सलाह | Source: NDtv.com

Varanasi Gyanvapi Case: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, वाराणसी ज्ञानवापी विवाद विशेष लोक अदालत को भेजा; बातचीत से समझौते की दी सलाहSource : NDtv.com

वाराणसी के चर्चित ज्ञानवापी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच लंबे समय से चल रहे इस मामले को विशेष लोक अदालत के सुपुर्द कर दिया है। कोर्ट ने दोनों पक्षों से आपसी संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाने का प्रयास करने को कहा है। विशेष लोक अदालत की कार्यवाही 21, 22 और 23 अगस्त को होगी। इससे पहले 14 जुलाई को वाराणसी में प्रस्तावित पूर्व-सुलह वार्ता (Pre-Lok Adalat Conciliation) पर सुनवाई की जाएगी।

क्या है दरअसल ज्ञानवापी विवाद? जानते हैं विस्तार से,

वाराणसी का ज्ञानवापी विवाद काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा एक लंबे समय से चल रहा ऐतिहासिक और कानूनी मामला है। हिंदू पक्ष का दावा है कि वर्ष 1669 में मुगल शासक औरंगजेब ने मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराया था। वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थल शुरू से ही मस्जिद रहा है।

हिंदू पक्ष का यह भी दावा है कि राजा विक्रमादित्य द्वारा निर्मित प्राचीन मंदिर के अवशेष आज भी मस्जिद की दीवारों और संरचना में देखे जा सकते हैं।

अगस्त 2021 में पांच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी की अदालत में याचिका दायर कर ज्ञानवापी परिसर की बाहरी दीवार पर स्थित मां श्रृंगार गौरी और अन्य देवी-देवताओं की नियमित पूजा की अनुमति मांगी थी। इसके बाद अदालत के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया। एएसआई की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा मस्जिद से पहले वहां एक विशाल हिंदू मंदिर मौजूद था।

जनवरी 2024 में वाराणसी जिला अदालत ने हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी परिसर के 'व्यास जी के तहखाने'में नियमित पूजा-पाठ की अनुमति दी थी। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का हवाला देते हुए कहता है कि 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बदला नहीं जा सकता। यही कानूनी और ऐतिहासिक विवाद फिलहाल विभिन्न अदालतों में विचाराधीन है।

यह पूरा मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट और वाराणसी की विभिन्न अदालतों में विचाराधीन है