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नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNESCO की एक नई रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि दुनिया के कई विकासशील देश शिक्षा से ज्यादा अपने विदेशी कर्ज की किस्तें चुकाने पर खर्च कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में 113 विकासशील देशों ने शिक्षा के बजट से अधिक राशि कर्ज चुकाने पर खर्च की। इन देशों में भारत भी शामिल है।


शिक्षा से पहले कर्ज क्यों?

रिपोर्ट के मुताबिक, कई विकासशील देशों पर विदेशी कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सरकारों को सबसे पहले कर्ज की किस्तें चुकानी पड़ती हैं, जिसके कारण शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए बजट कम बचता है। इस स्थिति को "क्राउडिंग आउट (Crowding Out)" कहा जाता है, यानी कर्ज का बोझ शिक्षा पर होने वाले खर्च को पीछे धकेल देता है।

UNESCO का कहना है कि यदि किसी देश पर 1 रुपये का अतिरिक्त कर्ज बढ़ता है, तो शिक्षा पर होने वाला खर्च औसतन 28 पैसे तक कम हो सकता है।


भारत को लेकर क्या कहती है रिपोर्ट?

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत शिक्षा की तुलना में कर्ज चुकाने पर लगभग 5 गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। हालांकि, UNESCO के अनुसार भारत की स्थिति कुछ अन्य देशों की तुलना में बेहतर है।

एशिया में श्रीलंका शिक्षा के मुकाबले कर्ज पर 16 गुना, जबकि पाकिस्तान लगभग 15 गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। यानी यदि श्रीलंका शिक्षा पर 1 रुपया खर्च करता है, तो कर्ज चुकाने पर करीब 16 रुपये खर्च करता है।


शिक्षा के लिए फंडिंग भी घट रही है

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विकासशील देशों को शिक्षा के लिए मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता लगातार कम हो रही है। लो और लोअर-मिडिल इनकम देशों के लिए शिक्षा फंडिंग में 2023 से अब तक 21% की कमी आ चुकी है और 2027 तक यह कमी 30% तक पहुंच सकती है।

अफगानिस्तान, माली, नाइजर और लाइबेरिया जैसे देशों में पिछले तीन वर्षों में शिक्षा के लिए मिलने वाली सहायता में 40% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।


UNESCO ने क्या दी चेतावनी?

UNESCO के शिक्षा विभाग के निदेशक मिन जियोंग किम ने कहा कि यदि सरकारें लगातार शिक्षा का बजट घटाकर कर्ज चुकाने को प्राथमिकता देती रहेंगी, तो इससे आर्थिक विकास, रोजगार और भविष्य में कर्ज चुकाने की क्षमता भी प्रभावित होगी। कमजोर शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और दीर्घकालिक विकास को कमजोर कर सकती है।


क्या है UNESCO की सलाह?

UNESCO ने सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से ऐसी दीर्घकालिक कर्ज राहत (Debt Relief) व्यवस्था बनाने की अपील की है, जिससे विकासशील देश शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर अधिक निवेश कर सकें। संस्था का मानना है कि मजबूत शिक्षा व्यवस्था ही भविष्य में आर्थिक विकास और कर्ज के बोझ को कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।