rere | Source: erreबच्चे को जन्म देना किसी महिला के लिए केवल कुछ घंटों की प्रक्रिया नहीं है। प्रसव के बाद भी शरीर लंबे समय तक कई तरह के शारीरिक और हार्मोनल बदलावों से गुजरता है। इसके बावजूद नई मां को अक्सर यह सुनना पड़ता है कि ‘इतने नखरे क्यों कर रही हो, एक बच्चा ही तो पैदा किया है’ या ‘हमने भी बच्चे पाले हैं, हमें तो इतनी तकलीफ नहीं हुई।’ पीडियाट्रिशियन डॉक्टर रोहित भारद्वाज ने इसी सोच पर सवाल उठाते हुए डिलीवरी के बाद महिला के शरीर में होने वाले बदलावों को समझाने की कोशिश की है।

‘एक बच्चा ही तो पैदा किया है’ कहने से पहले समझिए शरीर पर क्या गुजरती है

डॉक्टर रोहित भारद्वाज ने ऐसे लोगों की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि डिलीवरी के बाद महिला के शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने में समय लगता है। उनके मुताबिक, किसी महिला की तकलीफ को केवल इस आधार पर कम नहीं आंका जाना चाहिए कि उसने एक ही बच्चे को जन्म दिया है।

डिलीवरी के बाद महिला को आराम, देखभाल और भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है। इस दौरान उसके शरीर में होने वाले बदलावों को समझना परिवार के सदस्यों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

प्लेसेंटा निकलने के बाद गर्भाशय के अंदर बनता है बड़ा घाव

डॉक्टर रोहित भारद्वाज ने प्रसव के बाद प्लेसेंटा की भूमिका को समझाते हुए बताया कि प्लेसेंटा जहां गर्भाशय से जुड़ा होता है, उसके निकलने के बाद गर्भाशय के अंदर एक बड़ा घाव रह जाता है। लेख में इसे लगभग डिनर प्लेट के आकार के घाव के तौर पर बताया गया है।

यही कारण है कि प्रसव के बाद कई सप्ताह तक रक्तस्राव हो सकता है। इस दौरान शरीर खुले रक्त वाहिकाओं को ठीक करने और गर्भाशय को पहले के आकार में वापस लाने की प्रक्रिया में लगा रहता है।

लगभग एक किलोग्राम का गर्भाशय धीरे-धीरे छोटे आकार में लौटता है

गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय काफी बड़ा हो जाता है। डॉक्टर के बताए विवरण के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद यह गर्भाशय धीरे-धीरे सिकुड़कर अपने सामान्य आकार की ओर लौटता है।

इस प्रक्रिया में गर्भाशय के संकुचन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही संकुचन कई महिलाओं के लिए पेट में दर्द या ऐंठन का कारण बन सकते हैं। इसलिए प्रसव के बाद होने वाले पेट दर्द को हमेशा मामूली तकलीफ मानना उचित नहीं है।

स्तनपान के दौरान क्यों बढ़ सकती है पेट की ऐंठन

डॉक्टर के मुताबिक, स्तनपान कराने के दौरान गर्भाशय के संकुचन अधिक महसूस हो सकते हैं। इसका संबंध ऑक्सीटोसिन हार्मोन से है। स्तनपान के दौरान ऑक्सीटोसिन का स्राव होता है, जो दूध के प्रवाह में मदद करता है और गर्भाशय के संकुचन में भी भूमिका निभाता है।

इसी वजह से कुछ महिलाओं को बच्चे को स्तनपान कराते समय पेट में दर्द या ऐंठन अधिक महसूस हो सकती है। यह प्रसव के बाद शरीर के सामान्य रिकवरी तंत्र का हिस्सा हो सकता है, हालांकि बहुत अधिक या असामान्य दर्द होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

डिलीवरी के बाद अचानक क्यों बदल जाता है मूड

प्रसव के बाद महिला के शरीर में हार्मोन के स्तर में तेजी से बदलाव होता है। बच्चे के जन्म और प्लेसेंटा के बाहर निकलने के बाद हार्मोनल परिवर्तन नई मां के मूड और भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

इस दौरान बिना स्पष्ट कारण रोना, घबराहट, चिड़चिड़ापन या भावनात्मक उतार-चढ़ाव दिखाई दे सकते हैं। डॉक्टर ने इसे केवल ‘नखरा’ मानने के बजाय शरीर में होने वाले बड़े जैविक बदलावों के संदर्भ में समझने की जरूरत बताई है।

नींद पूरी न होना भी नई मां के लिए बड़ी चुनौती

बच्चे के जन्म के बाद मां की नींद भी अक्सर प्रभावित होती है। नवजात बच्चे की जरूरतों के कारण रात में बार-बार जागना पड़ सकता है। ऐसे में हार्मोनल बदलाव और नींद की कमी एक साथ नई मां के शारीरिक और मानसिक अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए परिवार के लोगों की भूमिका केवल बच्चे की देखभाल तक सीमित नहीं रहती। मां को पर्याप्त आराम और भावनात्मक सहयोग देना भी जरूरी होता है।

डिलीवरी के बाद बाल झड़ना भी हो सकता है

प्रसव के बाद कई महिलाओं में बाल झड़ने की समस्या देखने को मिलती है। डॉक्टर रोहित भारद्वाज के बताए विवरण के अनुसार, कुछ महिलाओं के बाल प्रसव के बाद कई सप्ताह या महीनों तक अधिक मात्रा में झड़ सकते हैं।

यह भी प्रसव के बाद होने वाले हार्मोनल बदलावों से जुड़ा हो सकता है। इसलिए बाल झड़ने को लेकर नई मां को ताने देने के बजाय उसकी स्थिति को समझना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना अधिक उचित है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन को नजरअंदाज करना ठीक नहीं

प्रसव के बाद मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े बदलावों को भी गंभीरता से लेना जरूरी है। लेख में डॉक्टर के हवाले से बताया गया है कि लगभग सात में से एक महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुजर सकती है।

लगातार उदासी, अत्यधिक चिंता, भावनात्मक परेशानी, खुद को अलग-थलग महसूस करना या रोजमर्रा के कामों में रुचि कम होना जैसे लक्षण दिखाई दें तो उन्हें केवल सामान्य मूड स्विंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

‘डिलीवरी रूम के अंदर एक लड़की गई थी, बाहर नई मां आई’

डॉक्टर रोहित भारद्वाज ने नई मां की भावनाओं को समझने और उनका सम्मान करने पर जोर दिया। उनका कहना है कि डिलीवरी रूम के अंदर एक लड़की गई थी और बाहर एक नई मां आई है। यह बदलाव केवल उसकी सामाजिक भूमिका में नहीं, बल्कि उसके शरीर और भावनाओं में भी होता है।

इसलिए परिवार और आसपास के लोगों को नई मां की तकलीफ की तुलना दूसरी महिलाओं से करने के बजाय उसकी व्यक्तिगत स्थिति को समझना चाहिए।

ताने नहीं, नई मां को चाहिए समझ और सहयोग

डिलीवरी के बाद महिला के शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने में समय लगता है। गर्भाशय का संकुचन, प्रसव के बाद रक्तस्राव, हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी, स्तनपान से जुड़ी परेशानियां और भावनात्मक उतार-चढ़ाव उसके अनुभव का हिस्सा हो सकते हैं।

ऐसे में ‘हमने भी बच्चे पैदा किए हैं’ या ‘एक बच्चा ही तो पैदा किया है’ जैसे ताने नई मां की परेशानी को कम नहीं करते। इसके बजाय परिवार का सहयोग, पर्याप्त आराम, पोषण और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह उसके लिए अधिक मददगार हो सकती है।

नई मां की तकलीफ को समझना ही सबसे जरूरी

बच्चे के जन्म के साथ एक महिला की जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, लेकिन उसके शरीर को भी इस बदलाव के साथ सामंजस्य बैठाने के लिए समय चाहिए। डॉक्टर रोहित भारद्वाज की बातों का मुख्य संदेश यही है कि प्रसव के बाद महिला की शारीरिक और भावनात्मक स्थिति को समझा जाए और उसकी परेशानियों को ‘नखरा’ कहकर खारिज न किया जाए। नई मां को तानों से ज्यादा समझ, आराम और सहयोग की जरूरत होती है।