erere | Source: rererनई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में स्वाइन फ्लू यानी H1N1 संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग और विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। दिल्ली में इस साल अब तक H1N1 के 1777 मामले सामने आ चुके हैं, जो पिछले साल की तुलना में कम से कम सात गुना अधिक बताए जा रहे हैं। बढ़ते संक्रमण के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बार वायरस तेजी से क्यों फैल रहा है और क्या इसका स्वरूप पहले से अलग है।

नई दिल्ली स्थित AIIMS के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने H1N1 के बढ़ते मामलों को लेकर वायरस के बदलते स्वरूप की जानकारी दी है। उनके अनुसार, वायरस में होने वाले बदलाव को मेडिकल भाषा में एंटीजेनिक ड्रिफ्ट कहा जाता है। इससे वायरस की संक्रामकता बढ़ सकती है और पहले से मौजूद प्रतिरोधक क्षमता के बावजूद संक्रमण होने की संभावना बनी रह सकती है। हालांकि, डॉ. गुलेरिया ने यह भी स्पष्ट किया है कि वायरस में म्यूटेशन होना एक सामान्य प्रक्रिया है और लोगों को घबराने या पैनिक करने की आवश्यकता नहीं है।

दिल्ली में 1777 मामले, केंद्र ने भी ली स्थिति की जानकारी

दिल्ली में H1N1 के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दिल्ली सरकार के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक में राजधानी में बढ़ते स्वाइन फ्लू संक्रमण की स्थिति और इससे निपटने की तैयारियों को लेकर चर्चा की गई।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस साल दिल्ली में H1N1 के 1777 मामले सामने आ चुके हैं। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में कम से कम सात गुना अधिक है। संक्रमण के बढ़ते मामलों ने खासतौर पर बुजुर्गों और पहले से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत को सामने रखा है।

एंटीजेनिक ड्रिफ्ट क्या है और इससे चिंता क्यों बढ़ी?

डॉ. रणदीप गुलेरिया के अनुसार, स्वाइन फ्लू वायरस की बाहरी संरचना समय के साथ धीरे-धीरे बदलती रहती है। वायरस में होने वाले इस बदलाव को एंटीजेनिक ड्रिफ्ट कहा जाता है। वायरस की संरचना में बदलाव आने के कारण शरीर की पहले से मौजूद प्रतिरोधक क्षमता उसे तुरंत पहचानने में उतनी प्रभावी नहीं हो सकती।

इसे सामान्य रूप से इस तरह समझा जा सकता है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जिस स्वरूप को पहले पहचान चुकी है, वायरस में बदलाव होने के बाद उसका नया स्वरूप कुछ अलग दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि पहले संक्रमण या टीकाकरण के कारण बनी प्रतिरोधक क्षमता के बावजूद संक्रमण की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वायरस हर स्थिति में गंभीर बीमारी पैदा करेगा। डॉ. गुलेरिया ने स्पष्ट किया है कि वायरस में बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है और मौजूदा स्थिति को लेकर अनावश्यक डर या घबराहट से बचना चाहिए।

बारिश और नमी ने भी बढ़ाई संक्रमण की चुनौती

H1N1 के प्रसार के पीछे केवल वायरस में होने वाले बदलाव को ही कारण नहीं माना जा रहा है। मानसून का मौसम भी संक्रमण के प्रसार में भूमिका निभा रहा है। बारिश और वातावरण में मौजूद नमी वायरस के लंबे समय तक बने रहने में मदद कर सकती है, जिससे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

डॉ. गुलेरिया के अनुसार, इस दौरान अस्पतालों में सांस लेने में परेशानी और निमोनिया से पीड़ित मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। हालांकि अधिकांश मरीज घर पर या सामान्य वार्ड में उपचार के बाद ठीक हो रहे हैं, लेकिन बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों में संक्रमण अधिक गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे मरीजों को कुछ मामलों में आईसीयू में भर्ती करने की जरूरत भी पड़ रही है।

H1N1 में कौन से लक्षण सामान्य हैं?

स्वाइन फ्लू के सामान्य लक्षणों में बुखार, खांसी, शरीर में दर्द, गले में खराश और नाक बहना शामिल हैं। शुरुआत में ये लक्षण सामान्य फ्लू जैसे दिखाई दे सकते हैं। यही वजह है कि कई बार लोग इसे साधारण वायरल संक्रमण समझ लेते हैं।

लेकिन कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सीने में दर्द या भारीपन, सांस लेने में परेशानी या सांस फूलना, लगातार बढ़ती खांसी और बलगम आना तथा चार से पांच दिन बीतने के बाद भी तेज बुखार का कम न होना गंभीर स्थिति की ओर संकेत कर सकता है।

ऐसे लक्षण दिखाई देने पर मरीज को चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। खासकर ऐसे लोगों में ज्यादा सावधानी जरूरी है जो पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।

बच्चों और बुजुर्गों में इन संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

बच्चों और बुजुर्गों में संक्रमण के लक्षण कई बार अलग तरीके से दिखाई दे सकते हैं। अत्यधिक सुस्ती, मानसिक सतर्कता में कमी, बच्चे का दूध या खाना छोड़ देना और बहुत तेजी से सांस लेना चिंता के संकेत हो सकते हैं।

ऐसे लक्षण यह संकेत दे सकते हैं कि संक्रमण ऊपरी श्वसन तंत्र से आगे बढ़कर फेफड़ों तक पहुंच गया है और निमोनिया का रूप ले सकता है। ऐसी स्थिति में बच्चे या बुजुर्ग को तुरंत चिकित्सकीय जांच की जरूरत होती है।

घर में एक मरीज तो पूरे परिवार पर संक्रमण का खतरा

H1N1 संक्रमण की एक महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि घर में एक व्यक्ति के बीमार पड़ने के बाद संक्रमण परिवार के दूसरे सदस्यों तक भी पहुंच सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वायरस लक्षण दिखाई देने से करीब एक दिन पहले ही दूसरे लोगों में फैलना शुरू कर सकता है।

स्कूल जाने वाले बच्चों के माध्यम से भी संक्रमण घर तक पहुंचने की संभावना रहती है। बच्चा स्कूल में संक्रमित होने के बाद घर लौटता है तो परिवार के अन्य सदस्यों के संपर्क में आने से संक्रमण फैल सकता है। इसलिए बीमारी के दौरान सावधानी बरतना बेहद महत्वपूर्ण है।

संक्रमण रोकने के लिए किन बातों का रखें ध्यान?

बीमार बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहिए, ताकि संक्रमण दूसरे बच्चों और उनके परिवारों तक न पहुंचे। मेट्रो, बस और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर जाते समय मास्क का इस्तेमाल संक्रमण से बचाव में मदद कर सकता है।

खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकना चाहिए। हाथों को साबुन से नियमित रूप से साफ करना या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को बुखार या खांसी है तो उसे घर के बुजुर्गों और छोटे बच्चों से उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए।

फ्लू वैक्सीन को लेकर डॉ. गुलेरिया की सलाह

भारत में वयस्कों के बीच फ्लू टीकाकरण की दर दो प्रतिशत से भी कम बताई गई है। डॉ. रणदीप गुलेरिया ने 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों तथा डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को फ्लू और न्युमोकोकल वैक्सीन लगवाने की सलाह दी है।

उन्होंने बताया कि वैक्सीन लगवाने के बाद संक्रमण की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती, लेकिन इससे बीमारी के गंभीर होने और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

घबराने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत

दिल्ली में H1N1 के बढ़ते मामलों के बीच विशेषज्ञों की सलाह का मुख्य संदेश यही है कि लोगों को घबराने के बजाय सावधानी बरतनी चाहिए। वायरस में बदलाव एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन बढ़ते संक्रमण के बीच जोखिम वाले लोगों को विशेष सतर्कता की जरूरत है।

बुखार, खांसी और शरीर में दर्द जैसे सामान्य लक्षणों पर नजर रखने के साथ सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, लगातार तेज बुखार या निमोनिया जैसे गंभीर संकेत दिखाई देने पर समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना महत्वपूर्ण है। बचाव के उपायों, व्यक्तिगत स्वच्छता और उपयुक्त टीकाकरण के जरिए संक्रमण के गंभीर प्रभावों के जोखिम को कम करने की कोशिश की जा सकती है।