राजनीति में कुछ सफर सिर्फ सत्ता तक पहुंचने की कहानी नहीं होते, बल्कि संघर्ष, धैर्य और भरोसे की ऐसी दास्तान बन जाते हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा छोड़ जाते हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी का मिदजिल दौरा भी कुछ ऐसा ही रहा। जिस जमीन ने उन्हें दो दशक पहले पहली राजनीतिक पहचान दी थी, उसी धरती पर मुख्यमंत्री के रूप में लौटना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक मूल और जनता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भावनात्मक क्षण था। 20 वर्षों के लंबे सफर में उन्होंने जीत, हार, विवाद, जेल, राजनीतिक बदलाव और सत्ता—हर रंग देखा, लेकिन आखिरकार उसी राजनीतिक ‘मायके’ में लौटकर उन्होंने यह संदेश दिया कि राजनीति में जड़ों से जुड़ाव ही सबसे बड़ी ताकत होती है।
मिदजिल में रेवंत रेड्डी
मिदजिल से शुरू हुई राजनीति, मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने का सफर
रेवंत रेड्डी की राजनीतिक यात्रा वर्ष 2006 में महबूबनगर जिले के मिदजिल क्षेत्र से शुरू हुई, जब उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जिला परिषद क्षेत्रीय समिति (ZPTC) का चुनाव जीतकर पहली बार सक्रिय राजनीति में कदम रखा। इससे पहले वे छात्र राजनीति में सक्रिय रहे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े थे। इसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार ऊपर बढ़ता गया। वे एमएलसी बने, कोडांगल से दो बार विधायक चुने गए, मल्काजगिरी से सांसद बने, फिर तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी (TPCC) की कमान संभाली और 2023 में कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत दिलाकर राज्य के मुख्यमंत्री बने। मिदजिल की यह यात्रा उनके राजनीतिक जीवन की आधारशिला मानी जाती है।
संघर्ष, विवाद और जेल... फिर भी नहीं टूटा हौसला
रेवंत रेड्डी का सफर कभी आसान नहीं रहा। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) में रहते हुए वे चंद्रबाबू नायडू के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे, लेकिन ‘कैश फॉर वोट’ मामले ने उनके राजनीतिक जीवन को सबसे बड़ा झटका दिया। इस प्रकरण में उन्हें 31 दिन जेल में भी रहना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दौर उनके करियर का सबसे कठिन समय था। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और 2017 में कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस में उन्होंने आक्रामक शैली और संगठनात्मक क्षमता के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई, जिसका परिणाम 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता वापसी के रूप में सामने आया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कायम हैं बेबाक तेवर
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी रेवंत रेड्डी अपनी स्पष्टवादिता और आक्रामक राजनीतिक शैली के कारण लगातार चर्चा में रहे हैं। कई बार उनके बयान राजनीतिक विवाद का कारण भी बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक मंच से ‘बड़े भाई’ कहकर संबोधित करने से लेकर हैदराबाद की अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के संदर्भ में दिए गए बयान तक, उन्होंने कई बार राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ी। विपक्ष के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर भी उनके कुछ फैसलों और कार्यशैली को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व का उन पर भरोसा कायम है और वे कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं।
अब विकास और वादों की अग्निपरीक्षा सामने
रेवंत रेड्डी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक सफलता को प्रशासनिक उपलब्धियों में बदलने की है। कांग्रेस ने चुनाव के दौरान कई महत्वाकांक्षी लोककल्याणकारी योजनाओं का वादा किया था, जिन्हें सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच पूरा करना आसान नहीं होगा। इसके साथ ही राज्य में आधारभूत ढांचे का विस्तार, निवेश बढ़ाना, केंद्र सरकार के साथ समन्वय बनाए रखना और बीआरएस व भाजपा जैसी मजबूत विपक्षी ताकतों का सामना करना भी उनकी जिम्मेदारी है। मिदजिल में लौटकर उन्होंने स्थानीय विकास के लिए बड़े निवेश का भरोसा दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भावनात्मक जुड़ाव के साथ शुरू हुई यह नई राजनीतिक पारी विकास के मोर्चे पर कितनी सफल साबित होती है।
