भारतीय सेना भविष्य के युद्धों की तैयारी में एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाने जा रही है। दशकों से देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे T-72 टैंकों को रिटायर करने के बजाय अब उन्हें अत्याधुनिक मानवरहित लड़ाकू वाहनों (Unmanned Combat Vehicles) में बदलने की योजना पर काम चल रहा है। सेना के बेड़े में मौजूद करीब 2,400 T-72 टैंक तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं, लेकिन नई ऑटोनॉमस तकनीक के जरिए इन्हें एक बार फिर युद्धक्षेत्र के लिए तैयार किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल पुराने सैन्य संसाधनों के पुनः उपयोग का उदाहरण नहीं है, बल्कि आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के अनुरूप भारतीय सेना की नई रणनीति को भी दर्शाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के अनुभवों ने दिखाया है कि पारंपरिक टैंकों के सामने ड्रोन और एंटी-टैंक हथियारों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में बिना चालक वाले टैंकों की भूमिका भविष्य में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
हाई रिस्क मिशनों में होंगे तैनात
भारतीय सेना इन रोबोटिक T-72 टैंकों का उपयोग उन मिशनों में करना चाहती है जहां सैनिकों की जान को सबसे अधिक खतरा होता है। इनमें बारूदी सुरंगों से भरे क्षेत्रों को साफ करना, दुश्मन के इलाके में शुरुआती घुसपैठ, निगरानी अभियान और अग्रिम हमला जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं।
इन टैंकों में लगी 125 मिमी स्मूदबोर तोप अपनी मौजूदा मारक क्षमता बरकरार रखेगी। अंतर केवल इतना होगा कि टैंक के भीतर कोई सैनिक मौजूद नहीं होगा और इसे दूर से नियंत्रित किया जा सकेगा या स्वचालित मोड में संचालित किया जाएगा।
MUM-T रणनीति पर सेना का फोकस
सेना की योजना इन मानवरहित टैंकों को T-90 भीष्म और भविष्य में शामिल होने वाले Future Ready Combat Vehicles (FRCV) के साथ मिलाकर संचालित करने की है। इस अवधारणा को Manned-Unmanned Teaming (MUM-T) कहा जाता है, जिसमें मानव चालक वाले और रोबोटिक प्लेटफॉर्म एक साथ मिलकर युद्ध अभियानों को अंजाम देते हैं।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह मॉडल युद्धक्षेत्र में जोखिम कम करने के साथ-साथ हमले की क्षमता को भी बढ़ा सकता है।
पुराने टैंक, नई तकनीक
योजना के तहत T-72 टैंकों में उन्नत सेंसर, कैमरे, संचार प्रणाली और ऑटोनॉमस कंट्रोल किट लगाई जाएंगी। इससे टैंक दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, लक्ष्य पहचानने और ऑपरेशन को अधिक प्रभावी ढंग से अंजाम देने में सक्षम होंगे।
सेना का मानना है कि इस तकनीकी उन्नयन से टैंकों की परिचालन आयु 15 से 20 वर्ष तक बढ़ सकती है, जिससे वे 2045 से 2050 तक उपयोग में बने रह सकते हैं।
स्क्रैप की जगह रणनीतिक निवेश
जानकारी के अनुसार, एक T-72 टैंक को मानवरहित प्लेटफॉर्म में बदलने पर लगभग 25 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी तरह नए प्लेटफॉर्म खरीदने की तुलना में यह विकल्प अधिक किफायती साबित हो सकता है।
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह परियोजना केवल पुराने टैंकों को बचाने की नहीं, बल्कि भविष्य के युद्धक्षेत्र के लिए सेना को तैयार करने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह योजना सफल होती है तो भारत उन देशों की सूची में शामिल हो सकता है जो बड़े पैमाने पर रोबोटिक बख्तरबंद युद्ध प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं।
