प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक, संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर अटकलें तेज। | Source: Aaj Tak .comप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि संसद के मॉनसून सत्र से पहले मोदी कैबिनेट में बदलाव हो सकता है। संभावित फेरबदल में आगामी चुनाव, सहयोगी दलों की भूमिका, बागी नेताओं की राजनीतिक स्थिति और सामाजिक-क्षेत्रीय समीकरण जैसे कई अहम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कैबिनेट का नया स्वरूप तय किया जा सकता है।

मोदी कैबिनेट विस्तार की चर्चाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वरिष्ठ मंत्रियों के साथ बैठक करते हुए।Source : AAJ TAK.COM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक, संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर अटकलें तेज।Source : Aaj Tak .com

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार और फेरबदल की संभावनाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जल्द ही कैबिनेट में नए चेहरों को शामिल करने के साथ कुछ मंत्रियों के विभागों में भी बदलाव किया जा सकता है। हाल ही में प्रधानमंत्री की केंद्रीय सचिवों के साथ हुई बैठक को भी संभावित मंत्रिमंडल विस्तार की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मंगलवार को केंद्रीय सचिवों के साथ बैठक कर विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज और योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की। बैठक में विभागवार प्रदर्शन का आकलन करने के साथ आगे की कार्ययोजना पर भी चर्चा हुई। माना जा रहा है कि सरकार जिन प्राथमिकताओं पर आगे बढ़ना चाहती है, उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रशासनिक और मंत्रिस्तरीय स्तर पर आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं।

मोदी कैबिनेट के संभावित विस्तार और फेरबदल की चर्चा के पीछे कई राजनीतिक और प्रशासनिक कारण बताए जा रहे हैं। केंद्र सरकार में अभी भी 9 मंत्री पद खाली हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश और हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली भाजपा की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके मंत्रिमंडल में बने रहने को लेकर भी चर्चाएं हैं। वहीं जॉर्ज कुरियन मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं, जबकि रवनीत सिंह बिट्टू को लेकर भी राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही हैं। इसके साथ ही हाल के दिनों में विभिन्न दलों के कुछ नेताओं के बदले राजनीतिक रुख ने भी मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाओं को लेकर चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

मोदी कैबिनेट का विस्तार कब हो सकता है?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि संसद के मानसून सत्र से पहले, यानी 5 जुलाई के आसपास मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा से 11 जुलाई को लौटने के बाद भी कैबिनेट विस्तार की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि केंद्रीय सचिवों के साथ हुई समीक्षा बैठक के जरिए सरकार आगामी प्राथमिकताओं और मंत्रालयों की कार्ययोजना को अंतिम रूप देने में जुटी है, ताकि मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल के बाद नई जिम्मेदारियों के अनुरूप प्रशासनिक ढांचा पहले से तैयार रहे।

मोदी सरकार का मंत्रिमंडल अभी देखें तो प्रधानमंत्री 30 कैबिनेट मंत्री 5 राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) 36 राज्यमंत्री हैं. इस तरह कुल 72 मंत्री हैं, लेकिन लोकसभा सांसदों के लिहाज से केंद्र सरकार में अधिकतम 81 मंत्री हो सकते हैं. इस तरह से 9 मंत्री पद अभी भी खाली हैं और जॉर्ज कुरियन इस्तीफा दे चुके हैं. इस लिहाज से 10 मंत्री पद तो साफ साफ खाली हैं. 

केंद्रीय मंत्रिमंडल के दो सदस्य पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश और हर्ष मल्होत्रा दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष बन गए हैं, जिनकी कैबिनेट से छुट्टी हो सकती हैं. इसके अलावा दो मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जार्ज कुरियन का राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होना है. इनमें कुरियन ने इस्तीफा दे दिया और जल्द ही रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री पद छोड़ सकते हैं. इसके अलावा कुछ मंत्रियों को उनकी खराब परफॉर्मेंस की वजह से भी हटाया जा सकता है।

कैबिनेट विस्तार में कितना अहम होगा 'बागी फैक्टर'?

संभावित कैबिनेट विस्तार में एक बड़ा सवाल उन नेताओं को लेकर भी है, जिन्होंने हाल के समय में सरकार या एनडीए का समर्थन किया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या भाजपा अपने पुराने सहयोगियों को प्राथमिकता देगी या फिर समर्थन देने वाले नए सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी। खासकर आम आदमी पार्टी, टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) से जुड़े उन नेताओं पर नजर बनी हुई है, जिन्होंने हाल के दिनों में सत्ता पक्ष के साथ कदम मिलाया है।

चर्चाओं के मुताबिक, ममता बनर्जी की पार्टी के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर खुद को NCPI नामक दल का सदस्य बताते हुए नरेंद्र मोदी सरकार को समर्थन देने की बात कही है। वहीं आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में शामिल होने और शिवसेना (यूबीटी) के छह 6 लोकसभा सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ आने से भी सत्तापक्ष का संख्याबल बढ़ा है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि इन घटनाक्रमों का असर संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में भी देखने को मिल सकता है।

उद्धव ठाकरे की पार्टी छोड़कर शिंदे वाली शिवसेना में शामिल हो चुके हैं, जिनकी पार्टी की संसद में राजनीतिक ताकत बढ़ने पर मुहर खुद गृह मंत्री अमित शाह तक लगा चुके हैं. ऐसे में मोदी मंत्रिमंडल में क्या शिंदे के खाते में नए मंत्री पद वाली ताकत बढ़ेगी? शिवसेना शिंदे के सांसदों की संख्या अब 13 हो चुकी है, जो जेडीयू से ज्यादा सांसद हो चुके हैं. जेडीयू को अभी दो सीट एक कैबिनेट, एक राज्य मंत्री की मिली है. इसी तरह टीडीपी से दो मंत्री हैं,जिसके चलते शिंदे की पार्टी का कोटा क्या बढ़ेगा. 

चुनावी राज्यों का फैक्टर का रखा जाएगा ख्याल?

मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार-फेरबदल का दूसरा कारण अगले वर्ष सात राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. यूपी, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव है. पंजाब और हिमाचल को छोड़कर सभी राज्य में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में चुनावी राज्यों के सियासी समीकरण को साधे रखने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है. 

केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार की चर्चा इसलिए भी हो रही है कि मंत्रियों के लगभग दो साल के कामकाज की समीक्षा संभावित थी. इस समीक्षा के तहत मंत्री पदोन्नत या पदावनत हो सकते हैं. यूपी से अभी 10 मंत्री हैं तो हिमाचल और उत्तराखंड से एक-एक मंत्री हैं. इसके अलावा पंजाब कोटे से रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री हैं, जिनकी जगह पर किसी नए चेहरो को लाया जा सकता है. 

सियासत में कोई भी पार्टी हो या सरकार, उसे सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को साधना होता है. माना जा रहा है कि मोदी सरकार भी कैबिनेट विस्तार में अपने मंत्रियों का चयन करते समय सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के फैक्टर का खास ख्याल रखेगी. हालांकि, ऐसा करते समय योग्यता को प्रथम वरीयता दी जा सकती है,क्योंकि कोई सरकार अपने मंत्रियों के कामकाज के आधार पर ही जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में समर्थ हो सकती है. 

सियासत और सरकार में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो केवल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों में संतुलन बैठाने का काम करते हैं, जिसे मोदी सरकार के लिए अपने मंत्री कसौटी पर खरे साबित करने की है. दलित और ओबीसी की सियासत जिस तरह से विपक्ष उठा रहा, उसके लिहाज से कैबिनेट का गठन किया जा सकता है.