erere | Source: erereनई दिल्ली। NEET UG 2026 के माध्यम से एमबीबीएस में प्रवेश पाने की तैयारी कर रहे हजारों अभ्यर्थियों के लिए दिल्ली की काउंसलिंग व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। दिल्ली में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए दो अलग-अलग काउंसलिंग प्राधिकरण होने के कारण शीर्ष रैंक प्राप्त करने वाले कई अभ्यर्थी एक साथ अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों की सीटें अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ता है जिनकी रैंक कटऑफ के बेहद करीब होती है। ऐसे अभ्यर्थियों को या तो दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेना पड़ता है या फिर अंतिम चरण यानी स्ट्रे वैकेंसी राउंड का इंतजार करना पड़ता है।

दिल्ली की दोहरी काउंसलिंग व्यवस्था बनी परेशानी की वजह

दिल्ली में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए दो स्वतंत्र काउंसलिंग प्रणालियां संचालित होती हैं। दोनों अलग-अलग सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म पर काम करती हैं और एक-दूसरे से जुड़ी नहीं हैं। इसी कारण टॉप रैंक वाले उम्मीदवार अंतिम निर्णय लेने तक दोनों जगहों पर आवंटित सीटों को बनाए रख सकते हैं। इससे कई सीटें लंबे समय तक अन्य अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध नहीं हो पातीं और कम रैंक वाले छात्रों की परेशानी बढ़ जाती है।

टॉप रैंकर्स के पास एक साथ कई सीटों का विकल्प

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि 54, 68, 76, 103, 183, 243 और 273 जैसी शीर्ष रैंक प्राप्त करने वाले कई अभ्यर्थियों के नाम मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) और गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी (GGSIPU) दोनों की सीट आवंटन सूची में शामिल थे। इससे इन उम्मीदवारों को अंतिम निर्णय लेने से पहले कई मेडिकल कॉलेजों का विकल्प अपने पास बनाए रखने का अवसर मिल जाता है, जबकि अन्य अभ्यर्थियों के लिए सीटों की उपलब्धता प्रभावित होती है।

बॉर्डरलाइन रैंक वाले छात्रों पर सबसे अधिक असर

इस व्यवस्था का सबसे अधिक नुकसान उन छात्रों को होता है जिनकी रैंक शुरुआती कटऑफ से थोड़ी नीचे होती है। उन्हें यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि बाद के राउंड में सीट खाली होगी या नहीं। इसी अनिश्चितता के कारण कई छात्र सुरक्षित विकल्प के रूप में दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश ले लेते हैं। एक बार दूसरे राज्य में प्रवेश लेने के बाद वे दिल्ली की स्ट्रे वैकेंसी राउंड में भाग लेने के पात्र नहीं रहते, भले ही बाद में दिल्ली में सीट खाली हो जाए।

एक छात्र ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि उनके सामने केवल दो विकल्प होते हैं। पहला यह कि सीट खाली होने की उम्मीद में इंतजार करें और दूसरा यह कि दूसरे राज्य में दाखिला लेकर एक वर्ष बर्बाद होने का जोखिम न उठाएं।

दिल्ली में कौन कराता है मेडिकल सीटों की काउंसलिंग

दिल्ली में मेडिकल कॉलेजों के लिए दो अलग-अलग संस्थाएं काउंसलिंग कराती हैं।

मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) दिल्ली के MAMC, LHMC, UCMS, VMMC तथा ABVIMS-RML जैसे मेडिकल कॉलेजों में 15 प्रतिशत अखिल भारतीय कोटा (AIQ) और संबंधित सीटों की काउंसलिंग कराती है।

वहीं गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी (GGSIPU) BSAMCH और NDMC मेडिकल कॉलेजों की 85 प्रतिशत दिल्ली कोटा सीटों पर अलग से काउंसलिंग कराती है।

अलग-अलग सॉफ्टवेयर होने से नहीं होता स्वतः समन्वय

दोनों काउंसलिंग प्रणालियां अलग-अलग सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म पर संचालित होती हैं। यदि किसी उम्मीदवार को दोनों प्रणालियों के माध्यम से सीट आवंटित हो जाती है, तो एक सीट स्वीकार करने तक दूसरी सीट स्वतः निरस्त नहीं होती। इसी वजह से कई सीटें अंतिम निर्णय तक अन्य अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध नहीं हो पातीं। वर्तमान व्यवस्था में ओवरलैपिंग सीट आवंटन के लिए कोई स्वचालित निरस्तीकरण प्रणाली मौजूद नहीं है।

विशेषज्ञों ने बताया, नियमों का उल्लंघन नहीं

विशेषज्ञों का कहना है कि उम्मीदवार दोनों काउंसलिंग प्रक्रियाओं में भाग लेकर किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। वास्तविक समस्या दोनों प्रणालियों के बीच समन्वय की कमी है। जब तक छात्र अंतिम विकल्प नहीं चुनता, तब तक दोनों स्थानों पर सीट सुरक्षित बनी रहती है।

रिपोर्ट में एक उदाहरण का उल्लेख किया गया है, जिसमें 183वीं रैंक वाले उम्मीदवार को मेडिकल काउंसलिंग कमेटी के माध्यम से VMMC तथा GGSIPU के माध्यम से BSAMCH दोनों में सीट आवंटित हुई थी।

अधिकांश राज्यों में क्यों नहीं आती ऐसी समस्या

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि यह किसी काउंसलिंग एजेंसी की विफलता नहीं बल्कि व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या है। अधिकांश राज्यों में सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए केवल एक ही काउंसलिंग प्राधिकरण कार्य करता है। एक ही प्लेटफॉर्म होने के कारण छात्र एक साथ दो अलग-अलग प्रणालियों में सीट सुरक्षित नहीं रख सकते। इससे प्रत्येक राउंड के बाद सीटें तेजी से खाली होकर अगले अभ्यर्थियों को आवंटित हो जाती हैं।

समाधान के लिए क्या सुझाव दिए गए

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान एक साझा अथवा एकीकृत काउंसलिंग प्लेटफॉर्म विकसित करना हो सकता है। ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया जा सकता है जो किसी छात्र द्वारा अंतिम विकल्प चुनते ही दूसरी सीट स्वतः निरस्त कर दे। इससे सीटें समय पर खाली होंगी और अन्य अभ्यर्थियों को शीघ्र अवसर मिल सकेगा।

एक अन्य सुझाव यह भी दिया गया है कि दिल्ली के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों को एक ही स्वास्थ्य विश्वविद्यालय के अधीन लाया जाए, जैसा कई अन्य राज्यों में पहले से लागू है। हालांकि स्वास्थ्य राज्य का विषय होने के कारण ऐसे सुधारों को लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है। आमतौर पर राज्य अपने प्रवेश एवं काउंसलिंग तंत्र पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि किसी छात्र को अगले राउंड में नई सीट मिलती है तो मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) को उसकी पहले से आवंटित सीट स्वतः निरस्त कर देनी चाहिए, ताकि खाली हुई सीट तुरंत अगले पात्र अभ्यर्थी को आवंटित की जा सके।