ere | Source: ereसालों तक धूम्रपान करने वाले लोगों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि क्या सिगरेट छोड़ने के बाद फेफड़े दोबारा स्वस्थ हो सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका जवाब पूरी तरह हां या ना में नहीं दिया जा सकता। धूम्रपान बंद करने के बाद शरीर और फेफड़ों में सुधार की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति कितने समय तक धूम्रपान या प्रदूषण के संपर्क में रहा, उसकी उम्र क्या है और फेफड़ों को पहले से कितना नुकसान पहुंच चुका है।

स्मोकिंग छोड़ना ही सबसे बड़ा कदम, यहीं से शुरू होती है रिकवरी

हर सिगरेट के धुएं के साथ कई हानिकारक कण और रसायन सांस की नली तथा फेफड़ों तक पहुंचते हैं। लंबे समय तक धूम्रपान करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और सीओपीडी जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। ऐसे में धूम्रपान छोड़ना फेफड़ों को आगे होने वाले नुकसान से बचाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय से धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के लिए भी इसे छोड़ना फायदेमंद होता है। धूम्रपान बंद करने के बाद समय के साथ सांस संबंधी परेशानियों में कमी आ सकती है और फेफड़ों की बची हुई कार्यक्षमता को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।

सिगरेट छोड़ते ही शरीर में शुरू हो जाते हैं कई बदलाव

फेफड़ों की रिकवरी कोई रातोंरात होने वाली प्रक्रिया नहीं है। धूम्रपान छोड़ने के बाद शरीर में कुछ बदलाव अपेक्षाकृत जल्दी शुरू हो सकते हैं, जबकि अन्य लाभ दिखाई देने में हफ्तों, महीनों या उससे अधिक समय लग सकता है।

धूम्रपान बंद करने के बाद खून में कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर कम होने लगता है। समय के साथ श्वसन तंत्र की सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया बेहतर हो सकती है। कुछ लोगों में खांसी, सांस फूलना और सांस लेते समय सीटी जैसी शिकायतों में भी कमी देखी जा सकती है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि फेफड़ों को हुआ हर पुराना नुकसान पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

पुरानी डैमेज हमेशा ठीक नहीं होती, लेकिन आगे का नुकसान रोका जा सकता है

यदि धूम्रपान के कारण फेफड़ों की संरचना को स्थायी नुकसान हो चुका है, तो उसे पूरी तरह पहले जैसी स्थिति में लाना संभव नहीं होता। उदाहरण के तौर पर एम्फाइसीमा में फेफड़ों के एयर सैक को नुकसान पहुंच सकता है, जिसकी भरपाई पूरी तरह संभव नहीं होती।

ऐसी स्थिति में धूम्रपान छोड़ने का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि इससे बीमारी के आगे बढ़ने की गति को कम करने और उपलब्ध फेफड़ों की कार्यक्षमता को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इसलिए लंग रिकवरी का मतलब हमेशा फेफड़ों का बिल्कुल पुरानी स्थिति में लौटना नहीं होता, बल्कि सांस लेने की क्षमता, लक्षणों और रोजमर्रा की गतिविधियों में सुधार तथा बची हुई फेफड़ों की क्षमता को सुरक्षित रखना भी रिकवरी का हिस्सा है।

प्रदूषण से भी फेफड़ों को लगातार नुकसान पहुंच सकता है

सिर्फ सिगरेट का धुआं ही फेफड़ों के लिए चिंता का विषय नहीं है। ट्रैफिक का धुआं, औद्योगिक प्रदूषक, धूल और हवा में मौजूद महीन कण लंबे समय तक सांस के साथ शरीर में जाने पर श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।

जब हवा की गुणवत्ता बहुत खराब हो, तो बाहर अनावश्यक समय बिताने से बचना उपयोगी हो सकता है। घर के अंदर धूल और धुएं के स्रोत कम रखना, उचित वेंटिलेशन और जरूरत के अनुसार एयर फिल्ट्रेशन जैसी व्यवस्थाएं भी मददगार हो सकती हैं। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को प्रदूषण के साथ-साथ धुएं के संयुक्त प्रभाव से बचने के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

एक्सरसाइज से फेफड़ों की फिटनेस को मिल सकता है फायदा

व्यायाम से पहले से नष्ट हो चुके फेफड़ों के टिश्यू दोबारा नहीं बनते, लेकिन नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर की समग्र फिटनेस और ऑक्सीजन के इस्तेमाल की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

जिन लोगों को सीओपीडी या दूसरी पुरानी सांस की बीमारी है, उनके लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार व्यायाम या पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन उपयोगी हो सकता है। हालांकि, लंबे समय से निष्क्रिय व्यक्ति को अचानक बहुत ज्यादा या कठिन व्यायाम शुरू करने के बजाय अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार गतिविधि बढ़ानी चाहिए।

‘लंग डिटॉक्स’ के नाम पर झांसे से रहें सावधान

बाजार में फेफड़ों को कुछ दिनों में साफ करने या पुरानी स्मोकिंग का असर खत्म करने वाले कई तरह के उत्पाद और घरेलू उपायों के दावे किए जाते हैं। किसी चाय, तेल, सप्लीमेंट या तथाकथित क्विक डिटॉक्स को फेफड़ों की पुरानी क्षति ठीक करने का प्रमाणित इलाज नहीं माना जा सकता।

फेफड़ों में हानिकारक कणों से निपटने की अपनी प्राकृतिक व्यवस्था होती है। इसलिए सबसे जरूरी कदम धूम्रपान बंद करना, प्रदूषण का संपर्क कम करना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, संतुलित आहार लेना और यदि कोई श्वसन बीमारी है तो उसका उचित इलाज कराना है।

इन संकेतों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

लंबे समय तक स्मोकिंग या प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले व्यक्ति को लगातार खांसी, बिना स्पष्ट कारण सांस फूलना, सांस लेते समय आवाज आना, बार-बार छाती का संक्रमण, खांसी में खून, सीने में परेशानी या सामान्य गतिविधियों के दौरान जल्दी थकान जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

ऐसे लक्षण लगातार बने रहें तो पल्मोनोलॉजिस्ट से जांच कराना जरूरी हो सकता है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार स्पाइरोमेट्री जैसे परीक्षणों की मदद से फेफड़ों की कार्यक्षमता का आकलन कर सकते हैं और बीमारी होने पर उसके अनुरूप उपचार की सलाह दे सकते हैं।

आखिर में सबसे अहम बात यह है कि फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाली आदत छोड़ने में कभी देर नहीं होती। पुराना नुकसान हर मामले में पूरी तरह वापस नहीं आता, लेकिन धूम्रपान बंद करना, प्रदूषण से बचाव करना और सही समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना फेफड़ों को आगे होने वाले नुकसान से बचाने और उपलब्ध क्षमता को बेहतर तरीके से बनाए रखने में मदद कर सकता है।