erer | Source: ererनई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार में बड़ी संख्या में पद खाली रहने को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। खरगे ने आरोप लगाया कि सरकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को सीधे खत्म करने के बजाय सरकारी नौकरियों के अवसरों को सीमित करके उसे कमजोर करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने इसे आरक्षण व्यवस्था को ‘चोर दरवाजे से खत्म करने की योजना’ बताया है।

2015 से 2024 के बीच खाली पदों में बढ़ोतरी का दावा

मल्लिकार्जुन खरगे ने सोमवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने सूचना का अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2015 में केंद्र सरकार में 4.21 लाख पद खाली थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 8.24 लाख हो गई। खरगे ने इसी आंकड़े को आधार बनाते हुए सरकार की रोजगार नीति पर सवाल उठाया और कहा कि बड़ी संख्या में पद रिक्त रहने का सीधा असर सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण के अवसरों पर पड़ता है।

खरगे के मुताबिक, केंद्र सरकार के अलग-अलग महत्वपूर्ण विभागों में भी बड़ी संख्या में पद खाली हैं। उन्होंने दावा किया कि रेलवे में 2.40 लाख, रक्षा क्षेत्र में 2.41 लाख और गृह मंत्रालय में 1.10 लाख पद रिक्त हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने इन आंकड़ों के जरिए यह सवाल उठाया कि जब सरकारी विभागों में स्वीकृत पदों पर नियुक्तियां ही नहीं होंगी तो आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों को संवैधानिक प्रावधानों के तहत मिलने वाले रोजगार के अवसर कैसे उपलब्ध होंगे।

‘सिर्फ रोजगार का मुद्दा नहीं, सामाजिक न्याय का सवाल’

कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने बयान में कहा कि इस पूरे मामले को केवल सरकारी नौकरियों की कमी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, सरकारी पदों पर भर्ती और आरक्षण का मुद्दा सामाजिक न्याय से भी सीधे जुड़ा हुआ है। खरगे ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए सरकारी नौकरियां लंबे समय से आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के तहत अवसर उपलब्ध कराने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकारी पद लंबे समय तक खाली रहते हैं तो आरक्षित वर्गों के लिए उपलब्ध अवसर भी कम हो जाते हैं। खरगे ने इसी आधार पर कहा कि आरक्षण समाप्त करने के लिए संविधान में बदलाव करना ही जरूरी नहीं है, बल्कि आरक्षण वाली नौकरियों की संख्या कम होना भी इस व्यवस्था के प्रभाव को कमजोर कर सकता है।

सार्वजनिक उपक्रमों में स्थायी नौकरियों का मुद्दा भी उठाया

मल्लिकार्जुन खरगे ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में रोजगार की स्थिति को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में 5.1 लाख स्थायी नौकरियां खत्म हो गईं। साथ ही उन्होंने कहा कि ठेका कर्मचारियों की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत से बढ़कर 49 प्रतिशत हो गई है।

खरगे का तर्क है कि स्थायी सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों के स्थान पर ठेका व्यवस्था बढ़ने से आरक्षण का लाभ प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि आरक्षण केवल सरकारी नीतियों और संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि नियमित और आरक्षित पदों पर वास्तविक नियुक्तियां कितनी हो रही हैं।

‘सरकारी पद खाली रखना भी आरक्षण के अवसर घटाता है’

खरगे ने आरोप लगाया कि सरकारी पदों को लंबे समय तक रिक्त रखना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश को बढ़ावा देना और स्थायी रोजगार के स्थान पर ठेका व्यवस्था को बढ़ाना ऐसी नीतियां हैं, जिनका असर आरक्षण के अवसरों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इन फैसलों से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने एक्स पोस्ट में कहा कि भाजपा की सामाजिक न्याय को लेकर नीति अब सामने आ गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के संविधान से मिले अधिकारों को एक कथित योजना के तहत कमजोर किया जा रहा है।

भाजपा पर ‘सामाजिक न्याय विरोधी’ होने का आरोप

मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा पर सामाजिक न्याय विरोधी एजेंडा अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकारी पदों को खाली रखना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश करना और ठेका व्यवस्था को बढ़ावा देना, इन सभी का असर आरक्षित वर्गों के रोजगार अवसरों पर पड़ता है।

खरगे ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश केवल किसी एक फैसले से नहीं बल्कि सरकारी रोजगार की संरचना में बदलाव के जरिए भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि यदि स्थायी नौकरियों और सरकारी पदों की संख्या घटती है तो आरक्षण के तहत मिलने वाले अवसर भी स्वाभाविक रूप से प्रभावित होंगे।

8.24 लाख रिक्तियों के आंकड़े ने बढ़ाई राजनीतिक बहस

केंद्र सरकार में 2015 में 4.21 लाख से बढ़कर 2024 में 8.24 लाख पद खाली होने के खरगे के दावे ने सरकारी रोजगार और आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस को फिर तेज कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष ने रेलवे, रक्षा और गृह मंत्रालय में बताए गए रिक्त पदों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में स्थायी रोजगार से जुड़े आंकड़ों को अपने आरोपों का आधार बनाया है।

इस मुद्दे पर खरगे का मुख्य जोर इस बात पर है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है, जब आरक्षित श्रेणी के पदों पर नियमित भर्ती हो और सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में पर्याप्त स्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध हों। उनका आरोप है कि रिक्तियों और ठेका व्यवस्था के बढ़ने से आरक्षण की व्यावहारिक पहुंच कमजोर हो सकती है।

खरगे ने उठाया रोजगार और संवैधानिक अधिकारों का सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार की रोजगार नीति को सामाजिक न्याय के व्यापक मुद्दे से जोड़ते हुए कहा कि मामला सिर्फ खाली पद भरने का नहीं है। उनके मुताबिक, सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान देश के वंचित और पिछड़े वर्गों को अवसर देने के लिए बनाया गया है। ऐसे में सरकारी पदों पर नियुक्तियां नहीं होने या स्थायी रोजगार के अवसर कम होने से इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है।

खरगे ने इसी संदर्भ में मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने के लिए संविधान में प्रत्यक्ष बदलाव की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि आरक्षित पदों पर रोजगार के अवसर कम कर देना भी आरक्षण के उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है।