एक तरफ पश्चिम एशिया में हालिया युद्ध के बाद तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, तो दूसरी ओर ईरान अपने सबसे प्रभावशाली नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने की तैयारी में जुटा है। इस ऐतिहासिक मौके पर भारत की मौजूदगी भी खास मानी जा रही है। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन अंतिम संस्कार समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। हालांकि सरकार ने अभी तक प्रतिनिधिमंडल के स्तर और नेतृत्व को लेकर अंतिम फैसला नहीं लिया है। ऐसे समय में भारत की यह भागीदारी सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि दोनों देशों के पुराने रिश्तों और बदलते वैश्विक समीकरणों के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है।अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत का संभावित प्रतिनिधिमंडल

अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत का संभावित प्रतिनिधिमंडल

भारत-ईरान रिश्तों के लिए अहम माना जा रहा है यह दौरा

भारत और ईरान के बीच दशकों पुराने रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने में ईरान भारत का अहम साझेदार रहा है। ऐसे में अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की संभावित मौजूदगी को कूटनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार प्रतिनिधिमंडल इस सप्ताह तेहरान रवाना हो सकता है, जबकि अंतिम संस्कार की मुख्य रस्में 4 जुलाई से शुरू होंगी। इससे पहले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आधिकारिक निमंत्रण भेजा था। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि भारत की ओर से किस स्तर का प्रतिनिधित्व होगा, लेकिन माना जा रहा है कि नई दिल्ली इस मौके पर दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाए रखने का संदेश देना चाहती है।

कई शहरों में होगी अंतिम यात्रा, दुनिया भर से आएंगे प्रतिनिधि

ईरान ने अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को कई चरणों में आयोजित करने की योजना बनाई है। जानकारी के अनुसार, उनके पार्थिव शरीर के साथ परिवार के चार अन्य सदस्यों के शव भी अलग-अलग धार्मिक स्थलों पर ले जाए जाएंगे। पहले कोम में प्रार्थना सभा होगी, इसके बाद पार्थिव शरीर इराक के नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा और आखिर में मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। तेहरान ने इस पूरे कार्यक्रम में दुनिया के कई देशों के प्रमुख नेताओं और प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया है। माना जा रहा है कि यह सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक और धार्मिक ताकत का भी बड़ा प्रदर्शन होगा। लाखों लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े अंतिम संस्कार आयोजनों में शामिल हो सकता है।

युद्ध के बाद बदले हालात, लेकिन तनाव अब भी पूरी तरह खत्म नहीं

अयातुल्ला खामेनेई का निधन ऐसे समय हुआ जब ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच सैन्य टकराव ने पूरे पश्चिम एशिया को हिला दिया था। हालिया संघर्ष में ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद वहां की सत्ता व्यवस्था कायम रही। बाद में अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम हुआ और दोनों देशों ने परमाणु कार्यक्रम समेत कई मुद्दों पर बातचीत शुरू करने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर सहमति जताई। जिनेवा में दोनों पक्षों के बीच वार्ता भी हुई, लेकिन हालात अभी पूरी तरह सामान्य नहीं माने जा रहे हैं। ऐसे माहौल में खामेनेई का अंतिम संस्कार सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस आयोजन के जरिए यह दिखाना चाहता है कि बाहरी दबावों के बावजूद उसकी राजनीतिक व्यवस्था मजबूत बनी हुई है।

भारत की संतुलित विदेश नीति फिर चर्चा में, पहले भी निभाई थी अहम भूमिका

भारत ने खामेनेई के निधन के बाद ईरानी दूतावास जाकर शोक दर्ज कराया था। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में शोक-पुस्तिका पर संदेश लिखकर संवेदना व्यक्त की थी। इससे पहले वर्ष 2024 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री होसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन के अंतिम संस्कार में भी शामिल हुए थे। यही वजह है कि इस बार भी भारत की मौजूदगी को उसकी संतुलित विदेश नीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए हुए है, तो दूसरी तरफ ईरान जैसे पुराने सहयोगियों के साथ भी कूटनीतिक संतुलन कायम रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में तेहरान में होने वाला यह दौरा आने वाले समय में भारत-ईरान संबंधों की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।