भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, लेकिन अब यहां महिलाओं की प्रजनन दर (Fertility Rate) तेजी से घट रही है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 पर पहुंच गया है, जो जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से कम है। इस बदलाव ने विशेषज्ञों के साथ-साथ उद्योगपति एलन मस्क की भी चिंता बढ़ा दी है।

क्या है रिप्लेसमेंट लेवल और भारत की स्थिति?

रिप्लेसमेंट लेवल वह प्रजनन दर है, जिस पर एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को पूरी तरह रिप्लेस कर सके और जनसंख्या स्थिर बनी रहे। विशेषज्ञों के अनुसार यह स्तर 2.1 माना जाता है, जबकि भारत का TFR अब 1.9 रह गया है।

द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 1950 में फर्टिलिटी रेट 6.18 था, जो 2021 तक घटकर 1.91 हो गया और अब इसमें और गिरावट दर्ज की जा रही है।

बड़े शहरों में सबसे ज्यादा गिरावट

फर्टिलिटी रेट में गिरावट शहरी क्षेत्रों में अधिक देखने को मिल रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली का फर्टिलिटी रेट घटकर 1.2 रह गया है, जो कई यूरोपीय देशों से भी कम है।

SRS Statistical Report 2024 के अनुसार, केवल छह राज्यों—बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड—में फर्टिलिटी रेट अभी भी 2.1 से ऊपर है। इनमें बिहार का TFR सबसे अधिक 2.9 दर्ज किया गया है।

फर्टिलिटी रेट घटने के प्रमुख कारण

शिक्षा और करियर पर बढ़ता फोकस: पढ़ी-लिखी महिलाओं में TFR 1.8 है, जबकि कम शिक्षित महिलाओं में यह 3.3 है। उच्च शिक्षा, करियर और देर से विवाह की प्रवृत्ति जन्म दर को प्रभावित कर रही है।

शहरीकरण और बढ़ती महंगाई: शहरों में रहने, स्वास्थ्य सेवाओं और बच्चों की शिक्षा का खर्च बढ़ने से लोग छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं।

फैमिली प्लानिंग तक बेहतर पहुंच: आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों के उपयोग में वृद्धि और परिवार नियोजन सेवाओं की बेहतर उपलब्धता भी जन्म दर में कमी का कारण बनी है।

बदलती सामाजिक सोच: युवा पीढ़ी करियर, आर्थिक स्थिरता और व्यक्तिगत जीवन को अधिक महत्व दे रही है। महिलाओं की प्रजनन संबंधी निर्णयों में भागीदारी भी बढ़ी है।

क्लाइमेट चेंज और प्रदूषण: कई शोधों में अत्यधिक गर्मी, वायु प्रदूषण और PM2.5 जैसे प्रदूषकों को फर्टिलिटी घटने, गर्भपात और प्रीमैच्योर डिलीवरी के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है।

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं पर करियर और परिवार दोनों की जिम्मेदारियों का बढ़ता दबाव भी जन्म दर में गिरावट का बड़ा कारण है। वहीं, बदलती जीवनशैली, देर से विवाह, सिंगल रहने की बढ़ती प्रवृत्ति और डिजिटल दुनिया में बढ़ता समय भी परिवार शुरू करने की दर को प्रभावित कर रहा है।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि फर्टिलिटी रेट लंबे समय तक बहुत कम रहा, तो भविष्य में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ेगा और कामकाजी युवाओं की संख्या घट सकती है, जिससे अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।

क्या आगे भी बढ़ेगी आबादी?

UNFPA की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आबादी अगले चार दशकों तक बढ़कर लगभग 1.7 अरब तक पहुंच सकती है, जिसके बाद इसमें गिरावट शुरू होने की संभावना है। फिलहाल कम फर्टिलिटी रेट का असर तुरंत आबादी में कमी के रूप में नहीं दिखेगा, लेकिन लंबे समय में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और देश की आयु संरचना में बड़ा बदलाव आ सकता है।