erer | Source: ererकरवाचौथ का व्रत भारतीय परंपरा में विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। लेकिन जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके लिए इस परंपरा के साथ अपनी और गर्भस्थ शिशु की सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गर्भावस्था के दौरान करवाचौथ का निर्जला व्रत रखना सुरक्षित है? क्या पूरे दिन पानी और भोजन से दूर रहने का असर मां और बच्चे पर पड़ सकता है? स्त्री रोग विशेषज्ञ और आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. निशिता हांडा ने इस विषय पर अपनी राय रखते हुए गर्भावस्था में ऐसे व्रत को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है।

प्रेग्नेंसी में करवाचौथ का व्रत रखना चाहिए या नहीं?

गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं। इस समय शरीर को पर्याप्त पानी, ऊर्जा और जरूरी पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, ताकि मां की सेहत बनी रहे और गर्भस्थ शिशु का विकास सामान्य रूप से हो सके। ऐसे में लंबे समय तक भोजन और पानी से दूर रहना हर गर्भवती महिला के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता। डॉ. निशिता हांडा के अनुसार, उनसे अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या गर्भावस्था में करवाचौथ का व्रत रखा जा सकता है। उन्होंने निर्जला व्रत को लेकर चिंता जताई है, क्योंकि इसमें पूरे दिन पानी नहीं पीया जाता। गर्भावस्था में ऐसा करने से महिला की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका हो सकती है। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान व्रत का जोखिम हर महिला की स्वास्थ्य स्थिति, गर्भावस्था के चरण और पहले से मौजूद समस्याओं पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी तरह का उपवास रखने से पहले अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। केवल परंपरा या परिवार के दबाव के कारण अपनी सेहत को जोखिम में डालना उचित नहीं है।

निर्जला व्रत से डिहाइड्रेशन और कमजोरी का खतरा

करवाचौथ के निर्जला व्रत में महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक पानी और भोजन का सेवन नहीं करती हैं। सामान्य परिस्थितियों में भी लंबे समय तक पानी नहीं पीने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है। गर्भावस्था में शरीर की जरूरतों को देखते हुए इस बात को विशेष रूप से गंभीरता से लेना चाहिए। डिहाइड्रेशन यानी शरीर में पानी की कमी होने पर प्यास अधिक लगना, मुंह सूखना, सिरदर्द, चक्कर आना, थकान और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर स्थिति में पेशाब कम हो सकता है और शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। गर्भवती महिलाओं में उल्टी, मतली या पहले से पानी की कमी की समस्या होने पर जोखिम बढ़ सकता है। गर्म मौसम, अधिक शारीरिक गतिविधि और लंबे समय तक तरल पदार्थ नहीं लेने से भी परेशानी बढ़ने की आशंका रहती है। इसलिए गर्भावस्था में निर्जला व्रत रखने का निर्णय बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं लेना चाहिए।

ब्लड शुगर कम होने से बढ़ सकती है परेशानी

गर्भावस्था के दौरान रक्त में शर्करा यानी ब्लड शुगर का संतुलन भी महत्वपूर्ण होता है। लंबे समय तक भोजन नहीं करने से कुछ महिलाओं में ब्लड शुगर कम हो सकती है। जिन महिलाओं को पहले से मधुमेह है या जो ब्लड शुगर नियंत्रित करने वाली दवाएं या इंसुलिन लेती हैं, उन्हें उपवास के दौरान विशेष सावधानी की जरूरत होती है। ब्लड शुगर कम होने पर पसीना आना, हाथ कांपना, चक्कर आना, तेज भूख लगना, घबराहट, कमजोरी और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे लक्षण हो सकते हैं। गंभीर स्थिति में बेहोशी भी आ सकती है। गर्भावस्था में मधुमेह या गर्भावधि मधुमेह से पीड़ित महिलाओं को अपने डॉक्टर की सलाह के बिना भोजन छोड़ने या उपवास करने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में नियमित अंतराल पर भोजन और ब्लड शुगर की निगरानी जरूरी हो सकती है। यदि किसी महिला को पहले से शुगर संबंधी समस्या है, तो करवाचौथ का निर्जला व्रत उसके लिए विशेष जोखिम पैदा कर सकता है।

क्या गर्भस्थ शिशु की हलचल पर भी पड़ सकता है असर?

गर्भावस्था के दौरान बच्चे की हलचल पर ध्यान देना मां और शिशु की सेहत की निगरानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। डॉ. निशिता हांडा ने अपने संदेश में बच्चे की हलचल कम होने की आशंका को लेकर भी चिंता जताई है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि बच्चे की हलचल कम होने का मतलब हमेशा डिहाइड्रेशन या भूखे रहने का प्रभाव नहीं होता। इसके कई कारण हो सकते हैं और इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि गर्भवती महिला को बच्चे की सामान्य गतिविधियों में कमी महसूस हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर या प्रसूति इकाई से संपर्क करना चाहिए। बच्चे की हलचल कम होने पर घरेलू उपायों के भरोसे इंतजार करना उचित नहीं है। गर्भावस्था में पर्याप्त पानी और पोषण लेना मां की सेहत के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए भी जरूरी है। इसलिए व्रत के दौरान अस्वस्थ महसूस होने या बच्चे की हलचल में बदलाव दिखने पर धार्मिक अनुष्ठान पूरा करने के लिए खुद को मजबूर नहीं करना चाहिए।

परंपरा अपनी जगह, लेकिन सेहत से समझौता नहीं

करवाचौथ कई महिलाओं के लिए आस्था, प्रेम और वैवाहिक संबंधों से जुड़ा त्योहार है। लेकिन गर्भावस्था में किसी भी धार्मिक परंपरा का पालन करते समय स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी है। व्रत का उद्देश्य परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र की कामना करना है, इसलिए इसे निभाने के लिए मां और बच्चे की सेहत को जोखिम में डालना उचित नहीं होगा। डॉ. निशिता हांडा ने गर्भावस्था में जोखिम भरे प्रयोगों से बचने की सलाह दी है। उनका संदेश है कि गर्भवती महिलाओं को पूरे दिन भूखे-प्यासे रहने जैसे कदम उठाने से पहले संभावित नुकसान पर विचार करना चाहिए। यदि कोई महिला धार्मिक आस्था के कारण करवाचौथ मनाना चाहती है, तो वह अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप सुरक्षित विकल्पों के बारे में डॉक्टर से चर्चा कर सकती है। परिवार के सदस्यों को भी गर्भवती महिला पर निर्जला व्रत रखने का दबाव नहीं डालना चाहिए। महिला की सेहत, गर्भावस्था की स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर ही यह तय होना चाहिए कि उसके लिए कौन-सा तरीका उपयुक्त है।

गर्भवती महिलाएं किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज?

यदि गर्भवती महिला को व्रत के दौरान चक्कर, अत्यधिक कमजोरी, बेहोशी जैसा महसूस होना, लगातार उल्टी, बहुत कम पेशाब या असामान्य घबराहट हो, तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। यदि बच्चे की हलचल कम हो जाए या सामान्य गतिविधियों में स्पष्ट बदलाव दिखाई दे, तो बिना देर किए अस्पताल या प्रसूति विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी है। गर्भावस्था में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, लगातार उल्टी, डिहाइड्रेशन या अन्य जटिलताएं होने पर उपवास के बारे में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसी महिलाओं को अपने डॉक्टर की स्पष्ट सलाह के बिना निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए।