rer | Source: ererनई दिल्ली। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन और राहुल गांधी की ओर से लगाए जा रहे आरोपों को झूठा और बेबुनियाद बताते हुए पार्टी के पुराने फैसलों पर सवाल खड़े किए। पीयूष गोयल का आरोप है कि कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयोग से जुड़े पदों पर रहे कुछ अधिकारियों को बाद में राजनीतिक या संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां और सम्मान दिए गए। उन्होंने इसे राजनीतिक लाभ पहुंचाने की परंपरा बताते हुए पूछा कि क्या इस तरह के फैसले निष्पक्षता पर सवाल खड़े नहीं करते?

कांग्रेस का व्यवहार बचकाना, पुराने फैसलों पर भी दे जवाब: पीयूष गोयल

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि कांग्रेस का व्यवहार बचकाना है और देश ने उसके रवैये को देखा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है, लेकिन अपने शासनकाल में लिए गए फैसलों और पुराने रिकॉर्ड पर चर्चा करने से बचती है। गोयल ने कहा कि कांग्रेस के कार्यकाल में एक मुख्य चुनाव आयुक्त को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली, जबकि अन्य अधिकारियों को राज्यपाल जैसे पदों पर नियुक्त किया गया। उन्होंने कुछ चुनाव आयुक्तों को सम्मान दिए जाने का भी जिक्र किया।

पीयूष गोयल के अनुसार, इन घटनाओं को देखते हुए कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर उसका अपना रिकॉर्ड क्या रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने चुनाव आयोग से जुड़े पदों पर काम करने वाले अधिकारियों को बाद में राजनीतिक पुरस्कार दिए। हालांकि, ये पीयूष गोयल के राजनीतिक आरोप हैं और उनके आधार पर संबंधित नियुक्तियों के पीछे किसी सौदेबाजी को अपने आप सिद्ध नहीं माना जा सकता।

एम.एस. गिल का उदाहरण देकर कांग्रेस को घेरा

पीयूष गोयल ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल का उदाहरण देते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “एक प्रकार से एम.एस. गिल जी का तो कभी सरकार में हैं, कभी इलेक्शन कमिश्नर बनते हैं, कभी पार्लियामेंट में पहुंच जाते हैं, कभी यूनियन कैबिनेट में जाते हैं। ये सौदेबाजी का ही प्रतीक लगता है।”

गोयल ने इस उदाहरण के जरिए यह सवाल उठाया कि चुनाव आयोग में महत्वपूर्ण पद पर काम करने के बाद किसी व्यक्ति को राजनीतिक या सरकारी पद दिए जाने से संस्थागत निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हो सकता है या नहीं। उनका आरोप है कि कांग्रेस के शासनकाल में ऐसे फैसले हुए, जिनसे चुनाव आयोग की स्वतंत्र भूमिका पर सवाल उठे। उन्होंने इस मुद्दे को मौजूदा राजनीतिक विवाद से जोड़ते हुए कांग्रेस से उसके पुराने फैसलों का जवाब मांगा।

टी.एन. शेषन के कार्यकाल के बाद राज्यपाल बनाए जाने का किया जिक्र

केंद्रीय मंत्री ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शेषन का मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल 31 दिसंबर 1985 को समाप्त हुआ था और इसके दो महीने के भीतर ही कांग्रेस ने उन्हें राज्यपाल बना दिया। गोयल ने इस उदाहरण को सामने रखते हुए कांग्रेस की नियुक्ति संबंधी नीति पर सवाल उठाए।

उन्होंने पूछा कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में काम करने वाले अधिकारियों को बाद में दूसरे पदों पर नियुक्त करने के फैसलों को किस नजर से देखा जाना चाहिए। पीयूष गोयल का तर्क है कि ऐसी नियुक्तियों को लेकर पारदर्शिता और निष्पक्षता पर चर्चा होनी चाहिए। हालांकि, इन उदाहरणों के आधार पर किसी नियुक्ति को रिश्वत या सौदेबाजी करार देने के लिए अलग से ठोस प्रमाण और संबंधित परिस्थितियों की जांच जरूरी है।

‘ऐसा पक्षपात शायद ही कहीं हुआ हो’, चुनाव आयोग के इस्तेमाल का आरोप

पीयूष गोयल ने कांग्रेस पर चुनाव आयोग के पदों और अधिकारियों का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में एक मुख्य चुनाव आयुक्त को पार्टी के टिकट पर उम्मीदवार बनाया गया, एक अन्य को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली और दो मुख्य चुनाव आयुक्तों को राज्यपाल बनाया गया। गोयल ने यह भी दावा किया कि चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों को उनके काम के बदले राजनीतिक पुरस्कार दिए गए।

उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने चुनाव आयुक्तों के कार्यालय की गरिमा को नुकसान पहुंचाया और संस्था का गलत इस्तेमाल किया। गोयल ने कहा कि इस तरह का पक्षपात शायद ही किसी दूसरी सरकार के समय देखने को मिला होगा। उनके बयान का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने पुराने फैसलों का भी हिसाब देना चाहिए।

नवीन चावला की नियुक्ति को लेकर सोनिया गांधी पर सवाल

पीयूष गोयल ने अपने बयान में वर्ष 2005 का भी जिक्र किया और कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “उस समय की सरकार कह रही थी कि सोनिया गांधी ने नवीन चावला को इलेक्शन कमिश्नर बनाया। सोनिया गांधी कैसे बना सकती हैं? वे तो सरकार में थीं नहीं। उस समय तो व्यवस्था ये थी कि प्रधानमंत्री और सरकार इलेक्शन कमिश्नर की नियुक्त करती थी। तो सोनिया गांधी जी कब से तय करने लगीं कि किसको क्या पद देना चाहिए? कौन चला रहा था सरकार तब?”

इस बयान के जरिए गोयल ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया और उस समय सत्ता तथा पार्टी नेतृत्व की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि यदि नियुक्ति सरकार की जिम्मेदारी थी, तो किसी राजनीतिक नेता के नाम पर नियुक्ति का श्रेय या आरोप लगाने का आधार क्या था। यह मुद्दा अब कांग्रेस और भाजपा के बीच चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर चल रही बहस का हिस्सा बन गया है।

टीकाराम मीणा का भी किया उल्लेख

पीयूष गोयल ने कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए टीकाराम मीणा का नाम भी लिया। उन्होंने कहा कि टीकाराम मीणा केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी थे और करीब एक वर्ष बाद उन्हें कांग्रेस की राजस्थान विधानसभा चुनाव से जुड़ी घोषणापत्र टीम में शामिल कर लिया गया तथा कांग्रेस पार्टी का सदस्य बना दिया गया।

गोयल ने इस उदाहरण को भी चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों और राजनीतिक दलों के बीच संबंधों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया। उनका आरोप है कि कांग्रेस के कार्यकाल में ऐसे कदम उठाए गए, जिनसे चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हुआ। हालांकि, इस तरह के आरोपों की वास्तविकता का आकलन करने के लिए नियुक्तियों का आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका देखना जरूरी है।

पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सलाह-मशविरा नहीं होता था: गोयल

केंद्रीय मंत्री ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की पुरानी व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले नियुक्ति के दौरान किसी अन्य पक्ष से सलाह-मशविरा नहीं किया जाता था। उनके अनुसार, सरकार जिसे चुनाव आयुक्त नियुक्त करना चाहती थी, उसे नियुक्त कर देती थी और फिर उसी व्यवस्था के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाता था।

गोयल ने कहा, “पहले CEC कैसे नियुक्त होते? सरकार नियुक्त करती थी. उसमें कोई सलाह-मश्वरा नहीं होता था. किसी प्रकार की बातचीत नहीं होती थी. जिसे सरकार ने बना दिया चुनाव आयुक्त बन गया. जिसे चाहा उसे चीफ बना दिया।”

उनकी टिप्पणी का उद्देश्य पुरानी नियुक्ति व्यवस्था और कांग्रेस के शासनकाल के फैसलों की आलोचना करना था। चुनाव आयोग की नियुक्तियों को लेकर पारदर्शिता, स्वतंत्रता और राजनीतिक प्रभाव का सवाल लंबे समय से सार्वजनिक बहस का विषय रहा है। ऐसे में पीयूष गोयल के बयान ने मौजूदा विवाद को एक बार फिर राजनीतिक रंग दे दिया है।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के बीच बढ़ी राजनीतिक बयानबाजी

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। कांग्रेस और विपक्षी दल चुनावी प्रक्रिया तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, पीयूष गोयल ने कांग्रेस के पुराने फैसलों का हवाला देकर उसके आरोपों को चुनौती दी है।

इस विवाद में एक ओर चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के सवाल हैं, तो दूसरी ओर भाजपा नेताओं की ओर से कांग्रेस के पुराने कार्यकाल और नियुक्तियों पर पलटवार किया जा रहा है। फिलहाल पीयूष गोयल के बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और चुनाव आयोग की नियुक्तियों तथा उसके कामकाज को लेकर आगे क्या राजनीतिक घटनाक्रम सामने आते हैं।