विधायक उमाशंकर सिंह ने लखनऊ में इलाज के दौरान ली अंतिम सांस. (Photo:AajTak)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'बलिया के शेर' और बहुजन समाज पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिने जाने वाले उमाशंकर सिंह का निधन न केवल उनके अपने क्षेत्र रसड़ा के लिए, बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक गलियारे के लिए एक न पूरी होने वाली क्षति है। महज 55 साल की उम्र में एक गंभीर बीमारी से लड़ते हुए उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली। उनके इस दुनिया से जाने से यूपी की सियासत में एक ऐसा खालीपन बन गया है, जिसे भर पाना हाल-फिलहाल मुमकिन नजर नहीं आता। उमाशंकर सिंह सिर्फ एक विधायक नहीं थे, बल्कि अपने आप में एक पूरा राजनीतिक संस्थान और मुश्किल वक्त में बसपा की नाव के आखिरी सहारा थे।
रसड़ा के बेताज बादशाह और अपराजेय नेता
बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट पर उमाशंकर सिंह का दबदबा कुछ ऐसा था कि कोई भी राजनीतिक लहर उनके अभेद्य किले को डिगा नहीं पाई। साल 2012 में उन्होंने पहली बार विधायक का चुनाव जीता और इसके बाद लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते चले गए। 2017 में बीजेपी की प्रचंड लहर हो या 2022 का ध्रुवीकृत चुनाव, रसड़ा की जनता ने हर बार अपने इस पसंदीदा नेता पर आंख बंद करके यकीन किया। उन्होंने लगातार तीन बार इस सीट से जीत दर्ज करके यह साबित कर दिया कि लोगों के दिलों पर राज करने के लिए सिर्फ किसी पार्टी का बैनर काफी नहीं होता, बल्कि खुद के काम और जमीनी जुड़ाव की जरूरत होती है।
बसपा के सबसे कठिन दौर में बने अकेले तारणहार
साल 2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी के पूरे इतिहास का सबसे मुश्किल दौर साबित हुआ था। जातीय और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बिखर चुके थे और पार्टी का कुनबा कमजोर पड़ रहा था। उस दौर में जब बसपा के कई बड़े-बड़े धुरंधर और पूर्व मंत्री अपनी साख और सीटें नहीं बचा सके, तब बलिया की माटी के लाल उमाशंकर सिंह अकेले अंगद की तरह अपनी सीट पर डटे रहे। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में वह बसपा के इकलौते ऐसे प्रत्याशी थे जिन्होंने जीत का झंडा गाड़ा। विधानसभा के भीतर वह मायावती की नीतियों और विचारों की अकेली मजबूत आवाज बने रहे, जिसने उन्हें पूरी राजनीति में एक अलग और सम्मानित मुकाम दिलाया।
बिज़नेस से राजनीति तक का बेमिसाल सफर
उमाशंकर सिंह का व्यक्तित्व काफी बहुआयामी था। राजनीति के गलियारों में कदम रखने से पहले उन्होंने खुद को एक बेहद सफल बिजनेसमैन के रूप में स्थापित किया था। उनकी कंपनी 'छात्र शक्ति कंस्ट्रक्शन' ने इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काफी नाम कमाया। बिजनेस वर्ल्ड की इसी समझ और दूरदर्शिता को उन्होंने बाद में समाज सेवा और राजनीति में उतारा। वह उत्तर प्रदेश के सबसे अमीर विधायकों की सूची में शुमार थे, लेकिन उनकी यह दौलत कभी उनके और आम जनता के बीच रुकावट नहीं बनी। इसके उलट, उन्होंने अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा हमेशा रसड़ा के विकास और गरीब-ज़रूरतमंदों की मदद में लगाया।
जनता के 'सुख-दुख के साथी' की विदाई
उमाशंकर सिंह की लोकप्रियता का सबसे बड़ा राज उनका सीधे आम लोगों से जुड़े रहना था। वह सिर्फ वोटों के समय दिखने वाले नेताओं में से नहीं थे, बल्कि हर सुख-दुख में रसड़ा के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते थे। उन्होंने अपने क्षेत्र में गरीब बेटियों के सामूहिक विवाह कराने की एक बेहद सराहनीय परंपरा शुरू की थी, जिसका पूरा खर्च वह खुद वहन करते थे। युवाओं के लिए मुफ्त वाई-फाई की सुविधा देना हो या फिर किसी मरीज के इलाज के लिए आधी रात को अस्पताल में खड़े होना, उनकी दरियादिली के किस्से पूरे पूर्वांचल में सुने जाते हैं। यही कारण है कि आज उनके जाने पर सिर्फ उनका परिवार ही नहीं, बल्कि रसड़ा का हर एक घर गमगीन है।


दलगत राजनीति से ऊपर हर दिल अजीज शख्सियत
उमाशंकर सिंह की स्वीकार्यता सिर्फ बसपा तक सीमित नहीं थी। वह दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर हर राजनीतिक दल के नेताओं के पसंदीदा थे। यही वजह रही कि उनके निधन की खबर आते ही पक्ष और विपक्ष का भेद खत्म हो गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव समेत सूबे के तमाम बड़े दिग्गजों ने उनके जाने पर गहरा दुख व्यक्त किया है। एक ऐसा नेता जो विधानसभा सदन में जनता के तीखे सवाल भी बेहद शालीनता से रखता था, आज हमेशा के लिए खामोश हो गया। यूपी विधानसभा में अब बसपा की बेंच पर वह अकेला जुझारू चेहरा कभी नहीं दिखेगा, जिसने कठिन से कठिन हालात में भी हिम्मत नहीं हारी। उमाशंकर सिंह को उनकी जनसेवा और राजनीतिक जीवटता के लिए हमेशा याद रखा जाएगा।
