
Source : News 18 Hindi
भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की मौत ने बिहार में पुलिस कार्रवाई पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 17 जून को हुई कथित मुठभेड़ में घायल होने के बाद भरत तिवारी की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। पुलिस का दावा है कि उन्होंने पुलिस टीम पर फायरिंग की थी, जिसके जवाब में कार्रवाई की गई। वहीं परिजन, ग्रामीण और कुछ प्रत्यक्षदर्शी आरोप लगा रहे हैं कि भरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें गोली मार दी गई। मामले को लेकर इलाके में भारी आक्रोश है और निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। बढ़ते विवाद के बीच शाहपुर थानाध्यक्ष समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है, जबकि पूरे मामले की जांच जारी है।
सोशल मीडिया से शुरू हुआ विवाद, फिर पहुंचा एनकाउंटर तक
भरत तिवारी पिछले कुछ दिनों से प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने फेसबुक लाइव के दौरान पुलिस और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए थे। इसी बीच उनके हाथ में पिस्टल लिए वीडियो भी वायरल हुआ, जिसके बाद पुलिस हरकत में आई। पुलिस का दावा है कि गिरफ्तारी के लिए पहुंची टीम पर भरत ने हथियार तान दिया और फायरिंग करते हुए भागने की कोशिश की। पुलिस के अनुसार पीछा करने के बाद जवाबी कार्रवाई में वह घायल हुआ और उसके पास से हथियार भी बरामद किया गया। दूसरी तरफ ग्रामीणों का कहना है कि भरत प्रशासनिक उपेक्षा और विस्थापित परिवारों की समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहे थे। स्थानीय लोगों के बीच उनकी पहचान एक ऐसे युवक की थी जो बिजली, सड़क, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के मुद्दों को प्रशासन तक पहुंचाता था। यही वजह है कि उनकी मौत के बाद बड़ी संख्या में लोग खुलकर परिवार के समर्थन में सामने आ गए।
ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आए कई सवाल, चश्मदीदों के दावे से बढ़ा विवाद
घटना के बाद जब मीडिया टीम ग्राउंड जीरो पर पहुंची तो कई ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस की कहानी पर सवाल खड़े किए। चश्मदीदों का दावा है कि जिस समय पुलिस पहुंची, उस वक्त इलाके में सामान्य गतिविधियां चल रही थीं। ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने पहले पूरे क्षेत्र की घेराबंदी की और लोगों को दूर कर दिया। कुछ लोगों का आरोप है कि भरत तिवारी पुलिस से बातचीत कर रहे थे और बाद में उन्होंने हथियार भी नीचे रख दिया था। इसके बावजूद गोली चलने की आवाज सुनाई दी। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। दूसरी ओर पुलिस अब भी अपनी कार्रवाई को वैध बता रही है। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब मृतक की मां आशा देवी ने आरोप लगाया कि उनके बेटे ने सरेंडर कर दिया था, फिर भी उसे कई गोलियां मारी गईं। पिता काशीनाथ तिवारी, जो बिहार पुलिस से सेवानिवृत्त सिपाही हैं, भी लगातार निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
मौत के बाद फूटा जनाक्रोश, जांच पर टिकी पूरे बिहार की नजर
भरत तिवारी का शव गांव पहुंचते ही माहौल और तनावपूर्ण हो गया। हजारों ग्रामीण सड़क पर उतर आए और आरा-बक्सर फोरलेन को जाम कर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। लोगों ने आरोप लगाया कि यह मुठभेड़ नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या है। बढ़ते दबाव और विरोध के बाद प्रशासन ने शाहपुर थानाध्यक्ष राजेश मालाकार समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। पोस्टमार्टम मेडिकल बोर्ड की निगरानी में कराया गया और पूरे मामले की जांच की प्रक्रिया शुरू की गई है। फिलहाल इस केस में दो अलग-अलग दावे मौजूद हैं—पुलिस का कहना है कि यह जवाबी कार्रवाई थी, जबकि परिवार और ग्रामीण इसे फर्जी एनकाउंटर बता रहे हैं। ऐसे में जांच रिपोर्ट ही तय करेगी कि भरत तिवारी की मौत कानून के तहत हुई कार्रवाई का परिणाम थी या फिर उन आरोपों में सच्चाई है जो आज भोजपुर से लेकर पूरे बिहार में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
