भारत की राजनीति में आने वाले वर्षों का सबसे बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा शायद परिसीमन (डिलिमिटेशन) बनने जा रहा है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर गंभीरता से काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक सरकार न केवल नया विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, बल्कि उससे पहले सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और राज्यों के बीच व्यापक सहमति बनाने की कोशिश भी कर रही है। यदि यह प्रक्रिया लागू होती है तो दशकों बाद देश के संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं और लोकसभा सीटों का वितरण बड़े पैमाने पर बदल सकता है। इसका असर केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा।

पचास साल पुरानी व्यवस्था पर क्यों हो रही है नई बहस?

वर्तमान लोकसभा सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है। जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व को लंबे समय तक स्थिर रखा गया था। इसके कारण दक्षिण भारत और कुछ अन्य राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि कई उत्तरी राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ती रही। अब जब परिसीमन का सवाल फिर सामने आया है, तो यह बहस तेज हो गई है कि क्या संसद में प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या के आधार पर तय होना चाहिए या फिर उन राज्यों के हितों की भी रक्षा होनी चाहिए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफल बनाया। यही वजह है कि परिसीमन केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह संघीय ढांचे और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा संवेदनशील विषय बन चुका है।


सरकार क्यों तलाश रही है राजनीतिक सहमति?

केंद्र सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक टकराव का कारण बनने से बचाना चाहती है। सूत्रों के अनुसार सरकार ने कई क्षेत्रीय दलों से बातचीत शुरू कर दी है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके), तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ चर्चा का उद्देश्य उनकी आशंकाओं को समझना और ऐसा फॉर्मूला तैयार करना है जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो। सरकार को यह भी एहसास है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया तो दक्षिण भारत और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी कम होने का डर हो सकता है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना बन सकती है। यही कारण है कि केंद्र किसी भी विधायी कदम से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति तैयार करने पर जोर दे रहा है।


परिसीमन का असर केवल सीटों तक सीमित नहीं रहेगा

विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन लागू होने पर देश का पूरा चुनावी भूगोल बदल सकता है। कई संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं बदलेंगी, कुछ सीटें बढ़ सकती हैं और कुछ क्षेत्रों का राजनीतिक महत्व भी बदल सकता है। इससे राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों दोनों की रणनीतियों पर असर पड़ेगा। इसके अलावा संसद में राज्यों की ताकत का नया संतुलन भी देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि यह प्रक्रिया केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा तय करने का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय संघवाद, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और भविष्य की राजनीतिक दिशा से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन चुकी है।


2029 चुनाव से पहले सबसे बड़ा संवैधानिक एजेंडा?

सरकारी सूत्रों के अनुसार क्षेत्रीय दलों के साथ अब तक की बातचीत सकारात्मक रही है और सरकार किसी भी अंतिम निर्णय से पहले व्यापक ढांचा तैयार करना चाहती है। यदि सहमति बनती है तो नया विधेयक संसद में लाया जा सकता है और 2029 के आम चुनावों से पहले परिसीमन प्रक्रिया को पूरा करने की कोशिश की जा सकती है। आने वाले समय में यह मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में रहने वाला है। क्योंकि इसका संबंध केवल सीटों की संख्या से नहीं, बल्कि इस सवाल से है कि बदलते भारत में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का नया स्वरूप कैसा होगा। 2029 का चुनाव केवल सरकार चुनने का चुनाव नहीं हो सकता, बल्कि वह नए राजनीतिक मानचित्र पर लड़ा जाने वाला पहला आम चुनाव भी साबित हो सकता है।


परिसीमन क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

परिसीमन वह संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके तहत देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है, ताकि जनसंख्या के अनुसार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। आमतौर पर यह प्रक्रिया जनगणना के आंकड़ों के आधार पर की जाती है। भारत में आखिरी बड़ा परिसीमन 2002 में हुआ था, लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या और राज्यों के बीच उनका बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखा गया था। अब जनसंख्या में बड़े बदलाव के बाद परिसीमन की चर्चा फिर तेज हो गई है। माना जा रहा है कि नई प्रक्रिया लागू होने पर कुछ राज्यों की लोकसभा सीटें बढ़ सकती हैं, जबकि कुछ राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। यही वजह है कि परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का मामला नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक संतुलन, संघीय ढांचे और संसद में राज्यों की ताकत से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील विषय माना जा रहा है।