100 दिन पहले शुरू हुई US-ईरान जंग को लेकर दुनिया भर में यह उम्मीद थी कि हालात जल्द सामान्य हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीते तीन महीनों से ज्यादा समय में इस संघर्ष ने हजारों लोगों की जान ले ली, लाखों परिवारों को बेघर कर दिया और पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिरता की आग में झोंक दिया। युद्ध की मार सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम नागरिक भी इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। कई शहर खंडहर में बदल गए, अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा और मानवीय संकट लगातार गहराता गया। रिपोर्टों के मुताबिक, इस जंग में अब तक 3,593 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, 10 लाख से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जबकि ईरानी नेतृत्व से जुड़े कई बड़े नाम भी इसकी चपेट में आए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि 100 दिनों की इस जंग ने आखिर कितनी तबाही मचाई और इसका असर कितना व्यापक रहा?
100 दिनों में कितनी तबाही हुई?
100 दिनों से जारी इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को गहरे मानवीय संकट में धकेल दिया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद अब तक करीब 7,000 लोगों की जान जा चुकी है। इनमें सबसे ज्यादा असर लेबनान और ईरान में देखने को मिला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लेबनान में 3,593 लोगों की मौत हुई है, जबकि ईरान में मृतकों की संख्या 3,468 बताई गई है। इसके अलावा इज़राइल, खाड़ी देशों और क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों से जुड़े हताहतों की भी खबरें सामने आई हैं।हालांकि, यह जंग सिर्फ मौतों तक सीमित नहीं रही। हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं, कई शहरों और कस्बों को भारी नुकसान पहुंचा है और लाखों लोगों की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह मानवीय संकट और भी गंभीर रूप ले सकता है।
10 लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी हुई तबाह
इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम लोगों ने चुकाई है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, संघर्ष के चलते केवल लेबनान में ही 10 लाख से अधिक लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। वहीं ईरान के कई इलाकों में भी बड़ी संख्या में परिवार सुरक्षित ठिकानों की तलाश में पलायन कर चुके हैं। लगातार हो रहे हमलों ने कई शहरों के रिहायशी इलाकों, अस्पतालों, सड़कों और जरूरी बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। लाखों लोग आज भी राहत शिविरों और अस्थायी ठिकानों पर रहने को मजबूर हैं, जिससे मानवीय संकट लगातार गहराता जा रहा है।
10 लाख से ज्यादा लोग हुए बेघर,
इस युद्ध का सबसे दर्दनाक असर आम नागरिकों पर देखने को मिला है। लगातार हो रहे हमलों और बढ़ती हिंसा के कारण लाखों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ लेबनान में ही 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं, जबकि ईरान के कई शहरों में भी बड़ी संख्या में परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े।युद्ध की वजह से कई रिहायशी इलाके तबाह हो गए हैं, अस्पतालों और सार्वजनिक सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है और बुनियादी ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हालात ऐसे हैं कि लाखों लोग राहत शिविरों और अस्थायी ठिकानों में रहने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष जल्द नहीं थमा, तो यह मानवीय संकट आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकता है।
क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा असर
संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। पहले जहां प्रतिदिन करीब 100 जहाज इस मार्ग से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या काफी कम हो गई है। इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी देखा गया है।
मुज्तबा और खामेनेई को लेकर क्या कहा जा रहा है?
जंग के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके परिवार से जुड़े कुछ सदस्यों को लेकर भी कई तरह के दावे सामने आए हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स और कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में कहा गया है कि संघर्ष के दौरान शीर्ष नेतृत्व के करीबी लोग प्रभावित हुए हैं और मुज्तबा खामेनेई के घायल होने की भी चर्चा हुई है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक स्तर पर पूरी तरह पुष्टि नहीं हो सकी है।ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के दौरान सामने आने वाली अपुष्ट रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया दावों को सावधानी से देखना चाहिए। जब तक किसी विश्वसनीय सरकारी या आधिकारिक स्रोत से पुष्टि न हो जाए, तब तक इन खबरों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।
