ere | Source: ereउत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए राजनीतिक दल के आगाज के साथ ही प्रशासनिक दुनिया से ताल्लुक रखने वाली एक चर्चित हस्ती के कदम ने ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसकी गूंज सोशल मीडिया से लेकर हर आम इंसान की जुबान पर है। एक ऐसी सख्त अफसर, जिनकी कार्यशैली के चर्चे कभी पूरे सूबे में हुआ करते थे, जब अचानक एक गांव की बुजुर्ग महिला के गले लगकर बच्चों की तरह फफक-फफक कर रो पड़ीं, तो नजारा देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि असल जिंदगी का वह वाकया है जिसने सियासत और संवेदना की एक नई परिभाषा लिख दी है।

मिर्जापुर पहुंचते ही क्यों छलक पड़े आंसू?

अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'जननीति भारत' के गठन के ऐलान के ठीक बाद, पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल जब अपने पुराने कार्यक्षेत्र मिर्जापुर की धरती पर पहुंचीं, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह दौरा इतिहास रचने वाला है। हलिया क्षेत्र के प्रसिद्ध गड़बड़ा धाम में मां शीतला देवी के दर्शन-पूजन के बाद जब उनका काफिला लहुरियादह गांव की तरफ बढ़ा, तो वहां एक ऐसा चमत्कारिक और दिल दहला देने वाला पल इंतजार कर रहा था, जिसने इंटरनेट की दुनिया में तहलका मचा दिया है।

गांव की तंग गलियों में पहुंचते ही जब दिव्या मित्तल की नजर बुजुर्ग महिला दुईजी देवी पर पड़ी, तो दोनों के बीच का फासला एक झटके में मिट गया। दुईजी देवी ने आगे बढ़कर पूर्व आईएएस अधिकारी को कसकर गले से लगा लिया और जैसे ही उनके मुंह से यह अल्फाज निकले— ‘बेटी बहुत दिन से इंतजार था तुम्हारा’—दिव्या मित्तल अपने आंसुओं को रोक नहीं पाईं। सड़क के बीचों-बीच दोनों का यह भावुक मिलन देख वहां मौजूद समर्थकों की सांसें थम गईं।

वर्ष 2023 के उस अधूरे वादे की गूंज, जो आज भी है नासूर

आखिर क्यों इस मुलाकात ने इंटरनेट पर तहलका मचाया हुआ है और लोग इस वीडियो को बार-बार देख रहे हैं? इसके पीछे है प्रशासनिक तंत्र और आम जनता की वह बुनियादी कसक, जो सालों से अनसुनी रह जाती है।

तथ्यों के मुताबिक, साल 2023 में जब दिव्या मित्तल मिर्जापुर की जिलाधिकारी (DM) थीं, तब वह इसी लहुरियादह गांव में पेयजल संकट का जायजा लेने पहुंची थीं। उसी दौरान दुईजी देवी और देवकली जैसी स्थानीय महिलाओं ने उनके सामने पानी की मांग के साथ-साथ एक बहुत बड़ी गुहार लगाई थी— गांव में बच्चों की पढ़ाई के लिए एक अदद स्कूल बनवाने की मांग।

ग्रामीणों का दर्द यह है कि गांव में माध्यमिक स्तर का विद्यालय न होने के कारण मासूम बच्चों को कई किलोमीटर दूर जोखिम भरे रास्तों से होकर पढ़ाई के लिए जाना पड़ता है। हालांकि, उस वक्त पानी की समस्या का तो समाधान शुरू हुआ, लेकिन जैसे ही स्कूल के निर्माण का कार्य जमीन पर उतरने लगा, वन विभाग की आपत्तियों ने इस नेक काम पर ब्रेक लगा दिया। तब से लेकर आज तक, वह स्कूल कागजों और फाइलों के बीच दम तोड़ रहा है, लेकिन ग्रामीणों के दिलों में उसकी उम्मीद आज भी जिंदा है।

वन विभाग की बेड़ियों में उलझा बच्चों का भविष्य

एक तरफ जहां प्रशासनिक नियमों और वन विभाग की कानूनी अड़चनों के चलते स्कूल का निर्माण कार्य ठप पड़ा है, वहीं दूसरी तरफ जनता की बुनियादी जरूरतें आज भी जस की तस बनी हुई हैं। ग्रामीणों का साफ तौर पर कहना है कि जब तक गांव के बच्चों को उनके घर के पास शिक्षा का अधिकार नहीं मिलता, तब तक हर विकास का दावा अधूरा है। दिव्या मित्तल के इस दौरे ने एक बार फिर उस ठंडे पड़े मुद्दे को हवा दे दी है, जिसके चलते सत्ता के गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। लगभग आधे घंटे तक गांव के बीच रुककर उन्होंने एक-एक ग्रामीण की पीड़ा को बेहद करीब से सुना और हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया।

'जननीति भारत' के जरिए सियासत में भूचाल लाने की तैयारी

महज प्रशासनिक नौकरी से इस्तीफा देकर सियासत के अखाड़े में उतरने वाली दिव्या मित्तल ने गत 15 अक्टूबर को अपनी नई राजनीतिक पार्टी 'जननीति भारत' के गठन का ऐलान किया था। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के दम पर मैदान में उतरेंगी और मिर्जापुर सदर सीट से चुनावी ताल ठोकेंगी।

उनका यह दावा है कि वह पारंपरिक राजनीति से हटकर एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना चाहती हैं, जहां जनता की आवाज सिर्फ सुनी ही न जाए, बल्कि नीतियां भी आम आदमी की जरूरतों के हिसाब से गढ़ी जाएं। बहरहाल, लहुरियादह गांव की माटी से जुड़ा यह इमोशनल वीडियो इस बात की गवाही दे रहा है कि भले ही कुर्सी और ओहदे बदल गए हों, लेकिन जनता और एक जनहितैषी अधिकारी के बीच का यह रिश्ता सियासत की बिसात पर सबसे बड़ा फेरबदल साबित हो सकता है।