कर्नाटक की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता परिवर्तन सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि कई राजनीतिक समीकरणों की नई शुरुआत माना जा रहा है। लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान, दिल्ली दरबार की बैठकों और नेतृत्व को लेकर बनी अनिश्चितता के बाद आखिरकार आज शाम नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। मुख्यमंत्री पद की शपथ को लेकर तस्वीर लगभग साफ मानी जा रही है, लेकिन आखिरी क्षण तक कैबिनेट और शक्ति संतुलन को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। पार्टी नेतृत्व लगातार मंथन में जुटा रहा और देर रात तक चली बैठकों ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया।
डिप्टी सीएम कौन? सबसे ज्यादा चर्चा इसी पद को लेकर
मुख्यमंत्री के नाम पर लगभग सहमति बनने के बावजूद उपमुख्यमंत्री पद को लेकर चर्चाएं लगातार तेज रहीं। राजनीतिक गलियारों में कई नामों की चर्चा हुई, लेकिन वरिष्ठ दलित नेता जी. परमेश्वर का नाम सबसे मजबूत माना जा रहा है। यदि ऐसा होता है तो नई सरकार सामाजिक संतुलन का बड़ा संदेश देने की कोशिश करेगी। पार्टी नेतृत्व भी आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है।
सादगी भरा शपथ ग्रहण, लेकिन राजनीतिक संदेश बेहद बड़ा
इस बार शपथ ग्रहण समारोह को अपेक्षाकृत सादा रखने का फैसला किया गया है। बताया जा रहा है कि बेंगलुरु में ट्रैफिक और भारी भीड़ की आशंका को देखते हुए कार्यक्रम को सीमित रखा गया है। हालांकि समारोह भले ही सादगीपूर्ण हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने बेहद बड़े हैं। राज्यभर से समर्थकों की नजरें आज शाम होने वाले शपथ ग्रहण पर टिकी हैं। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और राजधानी पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग चुकी है।
सिद्धारमैया की नई भूमिका ने बढ़ाई चर्चा
सत्ता परिवर्तन के बीच पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कांग्रेस कार्यसमिति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने को भी राजनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इससे यह संदेश देने की कोशिश भी दिखती है कि नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद वरिष्ठ नेताओं की भूमिका कम नहीं होगी।
नई सरकार से जनता की उम्मीदें, पहले फैसलों पर रहेगी नजर
शपथ ग्रहण के तुरंत बाद नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक होने की संभावना है। माना जा रहा है कि जनता से जुड़े कुछ बड़े फैसले और घोषणाएं शुरुआती दिनों में ही सामने आ सकती हैं। यही वजह है कि सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि आम जनता, उद्योग जगत और प्रशासनिक हलकों की निगाहें भी नई सरकार के पहले कदम पर टिकी हुई हैं।
शाम 4 बजे होने वाला शपथ ग्रहण सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कर्नाटक की राजनीति के नए दौर की शुरुआत है। मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह तस्वीर लगभग साफ दिख रही है, लेकिन असली कहानी मंत्रिमंडल के गठन, शक्ति संतुलन और आने वाले फैसलों में छिपी है। इसलिए आज की शाम सिर्फ शपथ की नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाली शाम भी मानी जा रही है।
