भारत में मैटरनल मोर्टलिटी में पिछले कुछ वर्षों के दौरान उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जो देश के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस उपलब्धि के बावजूद महिलाओं में एनीमिया की गंभीर समस्या अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के अनुसार देश में लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं, जो गर्भावस्था और प्रसव से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकता है।

एनीमिया क्यों है गंभीर समस्या?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक एनीमिया ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम हो जाता है। हीमोग्लोबिन की कमी के कारण शरीर के अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे कमजोरी, थकान, चक्कर आना और गंभीर मामलों में

गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

गर्भवती महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर

डॉक्टरों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया मां और बच्चे दोनों के लिए खतरा बन सकता है। इससे समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले शिशु का जन्म और प्रसव के दौरान जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के लिए एनीमिया की रोकथाम और समय पर उपचार बेहद जरूरी है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं में आयरन, फोलिक एसिड और अन्य पोषक तत्वों की कमी एनीमिया का प्रमुख कारण है। इसके अलावा संतुलित आहार की कमी, बार-बार गर्भधारण और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच भी इस समस्या को बढ़ाती है। विशेषज्ञों ने महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने, आयरन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ाने और डॉक्टर की सलाह के अनुसार सप्लीमेंट लेने की सलाह दी है।

जागरूकता और पोषण पर जोर

विशेषज्ञों का कहना है कि मातृ स्वास्थ्य में सुधार के लिए सिर्फ अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार ही पर्याप्त नहीं है। महिलाओं में पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाना, किशोरियों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना और एनीमिया की समय रहते पहचान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।