भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। दशकों से पर्यावरण संरक्षण, अवैध खनन और विकास परियोजनाओं के बीच संघर्ष का प्रतीक बनी अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कदम उठाया है, जिसका असर आने वाले वर्षों में राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक दिखाई दे सकता है। अदालत ने अरावली पर्वतमाला की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय करने के लिए पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस लंबे विवाद को सुलझाने की कोशिश है, जो वर्षों से यह तय नहीं कर पाया कि आखिर अरावली की वास्तविक सीमा और पहचान क्या है।
देश की पर्यावरणीय ढाल है अरावली
अरावली पर्वतमाला को केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला मानना इसकी भूमिका को कम करके आंकना होगा। करीब 700 किलोमीटर लंबी यह पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अरावली उत्तर भारत को रेगिस्तान बनने से बचाने वाली प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है। यह थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है, भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करती है और अनेक वन्यजीवों तथा दुर्लभ वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास है। पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, पत्थर खनन और निर्माण गतिविधियों ने अरावली को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। कई रिपोर्टों में यह सामने आया है कि पर्वतमाला के कई हिस्से खनन और अतिक्रमण की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इसी कारण पर्यावरणविद लगातार इसकी सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की मांग करते रहे हैं।
आखिर क्यों उलझा हुआ है अरावली का मामला?
अरावली को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसकी परिभाषा को लेकर है। अलग-अलग सरकारी एजेंसियां और राज्य सरकारें अरावली की पहचान के लिए अलग-अलग मानक अपनाती रही हैं। कहीं पहाड़ की ऊंचाई को आधार माना गया, तो कहीं भूगर्भीय संरचना को। कुछ जगहों पर वन क्षेत्र को आधार बनाया गया, जबकि कुछ मामलों में राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लिए गए !इसी असमानता की वजह से कई बार खनन कंपनियां और परियोजना संचालक यह दावा करते रहे कि संबंधित क्षेत्र अरावली का हिस्सा नहीं है। दूसरी ओर पर्यावरण संगठनों ने इसे अरावली क्षेत्र बताकर विरोध किया !परिणामस्वरूप अनेक मामले अदालतों तक पहुंचे और कानूनी विवाद लगातार बढ़ते गए। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब तक एक वैज्ञानिक और सर्वमान्य परिभाषा तय नहीं होगी, तब तक यह विवाद समाप्त नहीं हो सकता।
विशेषज्ञों की टीम तय करेगी भविष्य की दिशा
सुप्रीम कोर्ट ने जिस समिति का गठन किया है, उसकी अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) की महानिदेशक प्रोफेसर कंचन देवी करेंगी। समिति में वन सर्वेक्षण, भूविज्ञान, पर्यावरण प्रशासन और वनस्पति विज्ञान के अनुभवी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। अदालत ने समिति को केवल तकनीकी अध्ययन तक सीमित नहीं रखा है। उसे निर्देश दिया गया है कि वह विभिन्न राज्यों की सरकारों, पर्यावरण विशेषज्ञों, ग्रामीणों, किसानों, स्थानीय समुदायों, खनन पट्टा धारकों और गैर-सरकारी संगठनों से भी बातचीत करे। अदालत का मानना है कि अरावली से जुड़े किसी भी निर्णय का असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
खनन उद्योग पर बढ़ी चिंता
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का सबसे बड़ा असर खनन उद्योग पर पड़ सकता है। अरावली क्षेत्र में लंबे समय से पत्थर, बजरी और अन्य खनिजों का खनन होता रहा है। हालांकि पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को लेकर कई बार अदालतों ने प्रतिबंध भी लगाए हैं। अब शीर्ष अदालत ने समिति की अंतिम रिपोर्ट आने तक पूरे अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक बरकरार रखने का आदेश दिया है। अदालत का कहना है कि यदि बाद में यह पाया गया कि किसी क्षेत्र में की गई गतिविधियां पर्यावरण के लिए नुकसानदेह थीं, तो उस नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी। इसलिए एहतियाती कदम के तौर पर फिलहाल किसी भी नई खनन गतिविधि को अनुमति नहीं दी जाएगी।
पर्यावरण बनाम विकास नहीं, संतुलन की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य विकास कार्यों को रोकना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर ऐसा रास्ता निकालना है जो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों के हितों की रक्षा कर सके। अदालत चाहती है कि समिति ऐसा व्यावहारिक समाधान सुझाए, जिससे भविष्य में न तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचे और न ही विकास परियोजनाएं अनावश्यक कानूनी विवादों में फंसें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समिति एक स्पष्ट और स्वीकार्य परिभाषा तय करने में सफल होती है, तो भविष्य में अरावली से जुड़े अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। इससे पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया भी अधिक पारदर्शी होगी और संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिलेगी।
अब सबकी नजर रिपोर्ट पर
समिति को 31 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपनी है, जबकि मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी। पर्यावरणविद, खनन उद्योग, स्थानीय समुदाय और राज्य सरकारें सभी इस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। यह रिपोर्ट केवल अरावली की सीमाएं तय नहीं करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि आने वाले वर्षों में भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों और विकास की जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाता है। अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह कदम एक ऐसे समय में आया है, जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में यह फैसला केवल एक पर्वतमाला की सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरणीय सोच और विकास मॉडल की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव भी माना जा रहा है।
