नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को एक बार फिर अदालत से राहत मिली है। गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी खराब सेहत को देखते हुए इलाज के लिए विशेष अनुमति और अस्थायी राहत की अवधि बढ़ा दी है। हालांकि इस फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगे हैं कि गंभीर अपराध में दोषी ठहराए गए लोगों को बार-बार राहत मिलना कितना उचित है।यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था और साफ कहा था कि बढ़ती उम्र या बीमारी अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकती। ऐसे में एक तरफ सजा कायम है, तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य कारणों से राहत भी मिल रही है। यही वजह है कि इस फैसले को लेकर कानूनी और सामाजिक स्तर पर नई बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे मानवीय आधार पर लिया गया फैसला मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि गंभीर अपराधों में दोषी लोगों को बार-बार राहत मिलने से गलत संदेश जा सकता है।

क्या है पूरा मामला?

आसाराम 2013 के एक नाबालिग दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं और उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में उनकी अपील खारिज करते हुए नाबालिग से रेप के मामले में सजा को बरकरार रखा। हालांकि अदालत ने गैंगरेप और आपराधिक साजिश से जुड़े कुछ आरोपों में उन्हें आंशिक राहत दी थी, लेकिन मुख्य दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा यथावत रखी गई।

इलाज को लेकर क्या राहत मिली?

गुजरात हाईकोर्ट ने आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी अस्थायी राहत को 15 जून 2026 तक बढ़ाने की अनुमति दी। अदालत ने माना कि उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए लगातार मेडिकल निगरानी, समय-समय पर जांच और आपातकालीन चिकित्सा सुविधा की जरूरत है। इसी आधार पर उन्हें उपचार संबंधी सुविधा जारी रखने की अनुमति दी गई।

अदालत ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि राहत केवल स्वास्थ्य कारणों को ध्यान में रखकर दी जा रही है। वहीं राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि बढ़ती उम्र या खराब स्वास्थ्य अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकते। अदालत ने पीड़िता की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए सजा बरकरार रखी।