कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। पिछले कई महीनों से जिस नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा राजनीतिक गलियारों में चल रही थी, वह अब हकीकत का रूप लेती नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने वाले डीके शिवकुमार 3 जून को कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। उनके साथ लगभग 10 मंत्रियों के भी शपथ लेने की संभावना जताई जा रही है, जबकि राज्यसभा चुनाव के बाद 18 जून के पश्चात मंत्रिमंडल विस्तार की तैयारी है। हालांकि यह केवल मुख्यमंत्री बदलने की कहानी नहीं है। इसके पीछे कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन, जातीय समीकरण, संगठन और सरकार के बीच तालमेल तथा 2029 के चुनावों की रणनीति जैसे कई बड़े राजनीतिक पहलू छिपे हुए हैं।
आखिर क्यों अहम है यह सत्ता परिवर्तन?
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सबसे बड़ी लड़ाई सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मानी गई थी। चुनावी जीत में दोनों नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। एक ओर सिद्धारमैया का मजबूत सामाजिक आधार और प्रशासनिक अनुभव था, तो दूसरी ओर डीके शिवकुमार संगठन, संसाधन और विधायकों के बीच प्रभाव के कारण मजबूत दावेदार थे। उस समय कांग्रेस आलाकमान ने संतुलन साधते हुए सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया था और डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तभी से यह चर्चा चल रही थी कि तय समय के बाद नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। अब वही फार्मूला लागू होता दिख रहा है।
3 जून को शपथ, लेकिन तस्वीर उससे कहीं बड़ी
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस विधायक दल (CLP) की बैठक के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर औपचारिक घोषणा हो सकती है। पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक केसी वेणुगोपाल और रणदीप सिंह सुरजेवाला भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। बताया जा रहा है कि शपथ ग्रहण समारोह में केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि एक छोटा मंत्रिमंडल भी साथ शपथ लेगा। इसके बाद राज्यसभा चुनाव समाप्त होने पर विस्तृत कैबिनेट का गठन किया जाएगा। इस रणनीति के पीछे कांग्रेस की कोशिश है कि सत्ता परिवर्तन को व्यवस्थित तरीके से लागू किया जाए और किसी भी गुट में असंतोष की स्थिति पैदा न हो।
कैबिनेट में आधे चेहरे बदल सकते हैं
राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि डीके शिवकुमार के नेतृत्व में बनने वाली नई सरकार में लगभग 50 प्रतिशत नए चेहरे शामिल किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य सरकार को नई पहचान देना और विभिन्न क्षेत्रों तथा समुदायों को प्रतिनिधित्व देना बताया जा रहा है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाए रखने की होगी। लिंगायत, वोक्कालिगा, दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संतुलन साधे बिना कोई भी मंत्रिमंडल राजनीतिक रूप से सफल नहीं माना जाता। इसी वजह से कांग्रेस आलाकमान मंत्रिमंडल गठन में बेहद सतर्क दिखाई दे रहा है।
सिद्धारमैया गए, लेकिन प्रभाव नहीं जाएगा
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बावजूद सिद्धारमैया का राजनीतिक प्रभाव कम होने वाला नहीं माना जा रहा। पिछले दो दशकों में उन्होंने कर्नाटक की राजनीति में जो सामाजिक आधार तैयार किया है, वह आज भी कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। विशेष रूप से उनका 'अहिंडा' मॉडल- जिसमें अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय शामिल हैं- कांग्रेस की चुनावी सफलता की रीढ़ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व इस सामाजिक गठबंधन को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहता। यही कारण है कि नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद सिद्धारमैया को पूरी तरह किनारे करने का कोई संकेत नहीं दिख रहा।
राज्यसभा का प्रस्ताव ठुकराने के पीछे क्या संदेश है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजा जा सकता है, लेकिन उन्होंने राज्य की राजनीति में सक्रिय बने रहने का विकल्प चुना। इस फैसले को केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा। इसके जरिए उन्होंने संकेत दिया है कि कर्नाटक की राजनीति में उनकी भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि भविष्य में कांग्रेस सरकार और संगठन दोनों पर उनका प्रभाव बना रहेगा। यही वजह है कि डीके शिवकुमार के सामने प्रशासन चलाने के साथ-साथ पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखने की भी चुनौती होगी।
डीके शिवकुमार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होगी
डीके शिवकुमार लंबे समय से मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते रहे हैं। संगठन को मजबूत करने, विधायकों को एकजुट रखने और चुनावी रणनीति तैयार करने में उनकी भूमिका को कांग्रेस नेतृत्व भी स्वीकार करता है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी असली परीक्षा शुरू होगी। उन्हें न केवल सरकार चलानी होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस के भीतर दो समानांतर शक्ति केंद्रों की स्थिति टकराव में न बदले। एक तरफ सरकार की कमान उनके हाथ में होगी, जबकि दूसरी तरफ सिद्धारमैया का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बना रहेगा।
2029 की तैयारी भी शुरू
कांग्रेस इस नेतृत्व परिवर्तन को केवल वर्तमान सरकार के संदर्भ में नहीं देख रही है। पार्टी की नजर 2029 के लोकसभा चुनाव और अगले विधानसभा चुनाव पर भी है। डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं, जबकि सिद्धारमैया पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के बीच मजबूत पकड़ रखते हैं। कांग्रेस की रणनीति दोनों नेताओं की ताकत को साथ लेकर चलने की दिखाई देती है।अगर यह संतुलन बना रहता है तो पार्टी को फायदा हो सकता है, लेकिन यदि गुटबाजी बढ़ती है तो इसका असर सरकार और संगठन दोनों पर पड़ सकता है।
सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बदल रहा, कांग्रेस का सत्ता मॉडल भी बदल रहा है
कर्नाटक में होने वाला यह नेतृत्व परिवर्तन केवल एक व्यक्ति के मुख्यमंत्री बनने तक सीमित नहीं है। यह कांग्रेस की उस राजनीतिक रणनीति की परीक्षा भी है, जिसमें संगठन और सरकार के बीच शक्ति संतुलन बनाकर रखा जाता है। 3 जून को अगर डीके शिवकुमार शपथ लेते हैं, तो उनके सामने केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने की जिम्मेदारी नहीं होगी, बल्कि कांग्रेस के भीतर एकता बनाए रखने, सामाजिक समीकरणों को साधने और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती भी होगी। यही वजह है कि कर्नाटक का यह सत्ता परिवर्तन पूरे देश की राजनीति में भी खास दिलचस्पी का विषय बन गया है।
