2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी कहानी विपक्षी एकता और इंडिया गठबंधन के गठन की थी। इस गठबंधन की बुनियाद रखने वालों में सबसे आगे अगर किसी नेता का नाम लिया जाता है, तो वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। देशभर में घूमकर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की पहल उन्होंने ही की थी। लेकिन विडंबना यह रही कि जिस गठबंधन को खड़ा करने में उन्होंने सबसे ज्यादा मेहनत की, उसी गठबंधन से सबसे पहले उनका मोहभंग हो गया। अब जनता दल (यूनाइटेड) के कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा ने उन कारणों का खुलासा किया है, जिनकी वजह से नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन छोड़कर फिर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का दामन थाम लिया।

जब विपक्ष को एकजुट करने निकले थे नीतीश कुमार

साल 2023 में भाजपा के खिलाफ मजबूत राष्ट्रीय विकल्प तैयार करने की चर्चा तेज थी। उस समय बिहार में महागठबंधन सरकार चला रहे नीतीश कुमार ने विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। उन्होंने पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों तक जाकर नेताओं से मुलाकात की। जून 2023 में पटना में हुई विपक्षी दलों की पहली बड़ी बैठक को भी उनकी राजनीतिक पहल का परिणाम माना गया। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर इंडिया गठबंधन का रूप लिया। उस दौर में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी थी कि गठबंधन के समन्वय और संचालन की जिम्मेदारी नीतीश कुमार को मिल सकती है।


एक बैठक और बदल गया पूरा समीकरण

जदयू के अनुसार असली विवाद तब शुरू हुआ, जब विपक्षी नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक में पहले से बनी सहमति बदलने की कोशिश हुई। संजय कुमार झा का दावा है कि कांग्रेस समेत कई दल इस बात पर सहमत हो चुके थे कि गठबंधन के संचालन में नीतीश कुमार की केंद्रीय भूमिका होगी। हालांकि बाद में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने नया प्रस्ताव रख दिया। उनके अनुसार गठबंधन का संयोजक किसी दलित नेता को बनाया जाना चाहिए और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम सामने आया। जदयू का आरोप है कि इस प्रस्ताव ने पहले से बनी सहमति को तोड़ दिया और यहीं से विश्वास का संकट शुरू हो गया।


नीतीश को पद नहीं, भरोसे की चिंता थी

जदयू नेताओं का कहना है कि मामला केवल किसी पद या जिम्मेदारी का नहीं था। पार्टी का दावा है कि नीतीश कुमार को संयोजक बनने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं थी, लेकिन एक बार जब सभी दल किसी व्यवस्था पर सहमत हो जाएं और फिर अचानक उसे बदल दिया जाए, तो इससे भरोसे पर असर पड़ता है। जदयू का मानना है कि विपक्षी गठबंधन के भीतर निर्णय लेने की एकजुटता और स्पष्टता नहीं दिख रही थी। यही वजह थी कि नीतीश कुमार और उनके सहयोगियों को लगने लगा कि इतने बड़े राष्ट्रीय गठबंधन को लंबे समय तक साथ रखना मुश्किल होगा।


सीट बंटवारे से लेकर नेतृत्व तक बढ़ती गईं मुश्किलें

इंडिया गठबंधन के सामने केवल नेतृत्व का सवाल ही नहीं था, बल्कि राज्यों में राजनीतिक हितों का टकराव भी बड़ा मुद्दा बनता जा रहा था। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर मतभेद थे। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने थीं। कई राज्यों में विपक्षी दल एक-दूसरे के खिलाफ भी चुनाव लड़ रहे थे। ऐसे में गठबंधन की एकजुटता लगातार सवालों के घेरे में आती रही। जदयू का मानना है कि इन परिस्थितियों ने भी नीतीश कुमार के मन में गठबंधन को लेकर संदेह पैदा किया।


जनवरी 2024 में हुआ बड़ा राजनीतिक उलटफेर

2023 के आखिरी महीनों में ही बिहार की राजनीति में बदलाव के संकेत मिलने लगे थे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपना पाला बदल सकते हैं। आखिरकार 28 जनवरी 2024 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर महागठबंधन सरकार को समाप्त कर दिया। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से नई सरकार बनी और नीतीश कुमार फिर से एनडीए के साथ आ गए। यह फैसला केवल बिहार की राजनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति के लिए भी बड़ा झटका माना गया।


नीतीश के जाने के बाद क्यों कमजोर पड़ा इंडिया गठबंधन?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के बाहर निकलने के बाद इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती समन्वय की रही। लोकसभा चुनाव से पहले कई राज्यों में सीट बंटवारे को लेकर विवाद सामने आए। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस अलग-अलग रास्ते पर रहीं, जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच भी पूर्ण तालमेल नहीं बन सका। इन घटनाओं ने विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए। हालांकि लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन विपक्ष भी उस तरह का संयुक्त राजनीतिक लाभ नहीं उठा पाया, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।


अब भी चर्चा में है वह फैसला

दो साल बाद भी यह सवाल राजनीतिक गलियारों में गूंजता है कि अगर नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन में बने रहते, तो क्या विपक्ष की तस्वीर अलग होती? जदयू अब खुलकर ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल को उस राजनीतिक घटनाक्रम का जिम्मेदार बता रही है, जिसने विपक्षी एकता की सबसे बड़ी कोशिश को कमजोर कर दिया। दूसरी ओर विपक्षी दलों की अपनी-अपनी व्याख्या है। लेकिन इतना तय है कि 2023-24 का वह दौर भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प और निर्णायक अध्यायों में हमेशा याद किया जाएगा।