मेंटेनेंस से जुड़े एक अहम मामले में Supreme Court of India ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी बच्चे के भरण-पोषण का सवाल केवल जैविक रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों और संबंधों की वास्तविक स्थिति पर भी निर्भर करता है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि बच्चे का पालन-पोषण किसने किया, वह किसके साथ रहा और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी किसने निभाई। केवल यह तर्क देना कि व्यक्ति जैविक पिता नहीं है, अपने आप में मेंटेनेंस से बचने का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य बच्चे के हितों की रक्षा करना है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक बच्चे की जिम्मेदारी निभाता रहा है या उसे अपने परिवार का हिस्सा मानता रहा है, तो वह बाद में सिर्फ जैविक संबंध न होने का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला इस बात को मजबूत करता है कि मेंटेनेंस मामलों में अदालतें केवल तकनीकी पहलुओं पर नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक पहलुओं पर भी ध्यान देती हैं।
हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि हर मामला अपने तथ्यों के आधार पर तय किया जाएगा और कोई एक नियम सभी मामलों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
यह फैसला बताता है कि मेंटेनेंस से जुड़े मामलों में केवल “जैविक पिता” होना या न होना ही अंतिम निर्णय का आधार नहीं है। अदालत का मुख्य ध्यान बच्चे के हित और उसकी सुरक्षा पर रहता है, और उसी के अनुसार निर्णय लिया जाता है।
