उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी करीब एक साल का समय बाकी है, लेकिन पूर्वांचल की राजनीति में हलचल अभी से तेज होती दिख रही है। जहां समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस अभी अपने उम्मीदवारों और रणनीति को लेकर खुलकर सामने नहीं आई हैं, वहीं बहुजन समाज पार्टी ने समय से पहले अपने सियासी पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। जौनपुर की शाहगंज विधानसभा सीट से जुल्फेकार अहमद गामा को पार्टी का प्रभारी घोषित कर बसपा ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार वह चुनावी तैयारी में किसी तरह की देरी नहीं करना चाहती। शुक्रवार देर शाम शाहगंज नगर के जौनपुर मार्ग स्थित अखनसराय के एक मैरिज हाल में बसपा कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता, स्थानीय पदाधिकारी और समर्थक पहुंचे। कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह चुनावी नजर आया, जहां मंच से संगठन को मजबूत करने और आगामी चुनाव के लिए अभी से जुट जाने का संदेश दिया गया।


बसपा के जोन प्रभारी दिनेश चंद्रा ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए शाहगंज विधानसभा की जिम्मेदारी जुल्फेकार अहमद गामा को सौंपने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज पार्टी डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है और पार्टी प्रमुख मायावती बहुजन समाज के अधिकारों की लड़ाई मजबूती से लड़ रही हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर पार्टी को मजबूत करना है तो बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आगामी चुनाव आसान नहीं होगा और इसके लिए हर कार्यकर्ता को जमीन पर उतरकर काम करना होगा।


गामा कौन हैं?

जुल्फेकार अहमद गामा शाहगंज और आसपास के इलाकों में लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय माने जाते हैं। स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर रही है, जो विभिन्न समुदायों के बीच लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। क्षेत्र के सामाजिक कार्यक्रमों, जनसभाओं और स्थानीय मुद्दों में उनकी सक्रिय मौजूदगी रही है! राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा ने गामा पर दांव लगाकर मुस्लिम वोटों के साथ-साथ दलित और पिछड़े वर्गों के समीकरण को साधने की कोशिश की है। शाहगंज सीट पर यह समीकरण चुनावी नतीजों में बड़ी भूमिका निभाता है।


शाहगंज सीट पर क्यों अहम है यह दांव?

शाहगंज विधानसभा सीट पूर्वांचल की उन सीटों में मानी जाती है जहां जातीय और सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजों को सीधे प्रभावित करते हैं। इस क्षेत्र में मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। ऐसे में गामा को आगे कर बसपा अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की रणनीति पर काम करती दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा सिर्फ संगठनात्मक नियुक्ति नहीं कर रही, बल्कि वह यह संदेश देना चाहती है कि पार्टी पूर्वांचल में फिर से मजबूती के साथ वापसी करना चाहती है।


गामा ने क्या कहा?

जिम्मेदारी मिलने के बाद जुल्फेकार अहमद गामा ने पार्टी नेतृत्व का आभार जताया। उन्होंने कहा कि उन्हें जो जिम्मेदारी दी गई है, उसे वह पूरी ईमानदारी से निभाएंगे। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य सिर्फ राजनीति करना नहीं, बल्कि शाहगंज क्षेत्र के विकास को गति देना है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्थानीय समस्याएं उनके प्रमुख मुद्दे होंगे। गामा ने यह भी कहा कि वह सभी समाजों को साथ लेकर चलेंगे और क्षेत्र के हर वर्ग के लिए काम करेंगे।


दूसरे दलों के नेताओं की एंट्री से बढ़ा उत्साह

सम्मेलन के दौरान अन्य दलों से जुड़े कई लोगों ने बसपा की सदस्यता भी ग्रहण की। पार्टी नेताओं ने इसे संगठन की मजबूती का संकेत बताया। बसपा का दावा है कि जिस तरह लोग पार्टी से जुड़ रहे हैं, उससे साफ है कि जनता एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है।


सपा-भाजपा से पहले तैयारी क्यों?

पिछले कुछ चुनावों में बसपा का प्रदर्शन कमजोर रहा है, खासकर पूर्वांचल में पार्टी का जनाधार प्रभावित हुआ है। ऐसे में पार्टी इस बार पहले से तैयारी कर रही है ताकि चुनावी मैदान में मजबूत वापसी की जा सके। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि बसपा उम्मीदवारों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों की घोषणा जल्दी करके अपने कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरना चाहती है और विरोधी दलों पर दबाव बनाना चाहती है। फिलहाल शाहगंज में जुल्फेकार अहमद गामा को प्रभारी बनाए जाने के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी सरगर्मी अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी है और आने वाले दिनों में बाकी दल भी अपने सियासी पत्ते खोल सकते हैं।