मआज़ खान
"समान काम, समान वेतन" - ये सिर्फ संविधान की किताब का एक जुमला बनकर रह गया है। आज भारत का मजदूर दो हिस्सों में बंट चुका है। एक तरफ सरकारी दफ्तरों में बैठा परमानेंट कर्मचारी है जिसे हर सुविधा, हर भत्ता, नौकरी की गारंटी और रिटायरमेंट के बाद पेंशन मिलती है। दूसरी तरफ वही काम, कई बार उससे भी ज्यादा काम करने वाला अनुबंधित मजदूर है जिसे महीने के आखिर में आधी तनख्वाह, न कोई छुट्टी, न कोई भविष्य, न कोई इज्जत मिलती है।
सवाल ये है - ये दोहरा मापदंड कब तक चलेगा?
पब्लिक सेक्टर में "परमानेंट" का खात्मा - सबसे बड़ा धोखा, रेलवे, बैंक, बिजली विभाग, हॉस्पिटल, स्कूल, नगर निगम - जहाँ देखो अनुबंध पर भर्ती। सरकार खुद सबसे बड़ी ठेकेदार बन गई है।
आंकड़े डरावने हैं : केंद्र सरकार के 40% से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। पर भर्ती नहीं हो रही। उसकी जगह आउटसोर्सिंग कंपनियों से "मैनपावर सप्लाई" ली जा रही है।
नतीजा क्या?
सफाई कर्मचारी: नगर निगम में 25 साल से झाड़ू लगा रहा अनुबंधित कर्मचारी 12 हजार महीना पाता है। बगल में परमानेंट कर्मचारी 45 हजार। काम एक ही।
टीचर: सरकारी स्कूलों में गेस्ट टीचर 15 हजार में 8 पीरियड पढ़ाता है। परमानेंट टीचर 70 हजार में 6 पीरियड।
नर्स: अस्पताल में कोविड के समय जान जोखिम में डालने वाली अनुबंधित नर्स को 18 हजार, परमानेंट को 60 हजार + रिस्क भत्ता।
ये मजाक नहीं, सरकारी नीति है। "Equal Pay for Equal Work" का सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी फाइलों में दबा पड़ा है।
ठेकेदारी प्रथा: आधुनिक गुलामी का नया नाम
ठेकेदार हर महीने 30 हजार का बिल बनाता है, मजदूर को देता है 12 हजार। बाकी 18 हजार कमीशन। मजदूर शिकायत करे तो अगले दिन नौकरी से बाहर।
अनुबंधित मजदूर की जिंदगी
न पहचान: न ID कार्ड, न पे-स्लिप, न सर्विस बुक। कल को ठेकेदार बदले तो 10 साल की नौकरी जीरो।
न भविष्य: न PF, न ESI, न ग्रेच्युटी, न पेंशन। 60 साल की उम्र में खाली हाथ घर बैठो।
न आवाज: यूनियन बनाने पर नौकरी गई। हड़ताल की तो "एस्मा" लगाकर जेल।
सबसे शर्मनाक: परमानेंट कर्मचारी को दिवाली बोनस, LTC, मेडिकल, घर। अनुबंधित को दिवाली पर भी ड्यूटी - वो भी "नो वर्क, नो पे" पर।
सरकार की दलील vs मजदूर की हकीकत
सरकार कहती है:
"खर्चा कम करने के लिए अनुबंध जरूरी है। परमानेंट कर्मचारी काम नहीं करते।"
मजदूर पूछता है:
1. अगर हम काम नहीं करते तो स्कूल, अस्पताल, ट्रेन कौन चला रहा है? 70% काम तो हमीं कर रहे हैं।
2. खर्चा कम करना है तो मंत्री के बंगले, गाड़ी, विदेश दौरे बंद करो। गरीब की रोटी क्यों छीनते हो?
3. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा - "10 साल से काम कर रहे अनुबंधित को परमानेंट करो"। 2026 आ गया, लागू किसने किया?
सच ये है कि अनुबंधित मजदूर = सस्ता मजदूर, बिना जवाबदेही वाला मजदूर। सरकार और प्राइवेट कंपनी दोनों को यही चाहिए।
अब क्या करे मजदूर? 5 सूत्री इंकलाब
ये लेख सिर्फ दर्द बांटने के लिए नहीं, हक दिलाने के लिए है। मांग साफ होनी चाहिए:
1. "समान काम, समान वेतन" कानून बनाकर सख्ती से लागू हो
जिस दिन से अनुबंधित कर्मचारी जॉइन करे, उसी दिन से परमानेंट कर्मचारी के बराबर न्यूनतम वेतन + DA मिले। सुप्रीम कोर्ट का आदेश जमीन पर उतरे।
2. "ठेका प्रथा बंद करो, परमानेंट भर्ती चालू करो"
रेलवे, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे जरूरी सेक्टर में परमानेंट पोस्ट खत्म करना बंद हो। खाली पड़े 30 लाख पदों पर तुरंत भर्ती हो।
3. "10 साल वाले को परमानेंट करो"
जो कर्मचारी 10 साल या 240 दिन से ज्यादा लगातार काम कर चुका है, उसे बिना परीक्षा सीधा परमानेंट किया जाए। उमंगेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ झारखंड केस लागू हो।
4. "सोशल सिक्योरिटी सबके लिए"
हर अनुबंधित मजदूर का PF, ESI, ग्रेच्युटी अकाउंट पहले दिन से खुले। सरकार उसकी गारंटी ले, ठेकेदार के भरोसे न छोड़े।
5. "शोषण पर जेल
ठेकेदार अगर न्यूनतम वेतन न दे, PF न काटे, तो सीधा गैर-जमानती केस दर्ज हो। लेबर इंस्पेक्टर की जवाबदेही तय हो।
आखिरी बात: मजदूर की चुप्पी टूटेगी तो तख्त हिलेगा
1 मई को झंडा फहराकर, भाषण देकर घर चले जाने से हक नहीं मिलेगा।
याद रखो:
8 घंटे काम का हक शिकागो के मजदूरों ने खून बहाकर लिया था।
भारत में बोनस का कानून 1965 में मजदूरों की हड़ताल से आया था।
अनुबंधित मजदूर देश की रीढ़ है। रेल वही चलाता है, बच्चा वही पढ़ाता है, मरीज का इलाज वही करता है, शहर साफ वही रखता है।
अगर रीढ़ ही टेढ़ी रहेगी, तो देश सीधा कैसे खड़ा होगा?
इंकलाब जिंदाबाद। मजदूर एकता जिंदाबाद।
