हर साल मई के अंत और जून की शुरुआत में उत्तर भारत के कई हिस्सों में भीषण गर्मी और उमस लोगों की परेशानी बढ़ा देती है। कई राज्यों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह बदलाव अचानक नहीं होता, बल्कि इसके पीछे खगोलीय, मौसमी और भूगर्भीय कारण जिम्मेदार होते हैं। पृथ्वी की स्थिति, सूर्य की किरणों का कोण, सूखी जमीन और मॉनसून से पहले का मौसम मिलकर इस अत्यधिक गर्मी को पैदा करते हैं।
सूर्य के कर्क रेखा पर पहुंचने से बढ़ती है गर्मी
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 23.5 डिग्री झुकाव के साथ करती है। मई के अंत और जून की शुरुआत में सूर्य कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के ठीक ऊपर पहुंच जाता है। इस दौरान उत्तरी गोलार्ध, जहां भारत स्थित है, सूर्य की ओर सबसे ज्यादा झुका होता है।
इस समय सूर्य की किरणें उत्तर भारत के मैदानी इलाकों पर लगभग सीधी पड़ती हैं। इससे जमीन को प्रति वर्ग मीटर अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं, जिससे धरती तेजी से गर्म होती है। NASA और भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अध्ययनों में इस अवधि को “प्री-मॉनसून मैक्सीमम हीटिंग पीरियड” कहा गया है।
सूखी जमीन और कम नमी बढ़ाती है तापमान
मार्च और अप्रैल से बारिश न होने की वजह से मिट्टी पूरी तरह सूख जाती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक सूखी जमीन गर्मी को तेजी से सोखती है और जल्दी गर्म हो जाती है। वहीं गर्मियों में पेड़-पौधे भी कम हो जाते हैं, जिससे वातावरण में नमी कम बनने लगती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़-पौधों की कमी से भाप बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है, जिससे हवा और ज्यादा गर्म महसूस होती है। इसके अलावा राजस्थान और पाकिस्तान की तरफ से आने वाली गर्म और सूखी पछुआ हवाएं तापमान को और बढ़ा देती हैं। इन्हें आम भाषा में लू कहा जाता है।
मॉनसून से पहले क्यों बढ़ जाती है उमस?
मई के अंत तक मॉनसून की तैयारी शुरू हो जाती है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नमी भरी हवाएं उत्तर भारत की ओर बढ़ने लगती हैं। हालांकि इस समय तक बारिश नहीं होती, लेकिन हवा में नमी यानी ह्यूमिडिटी बढ़ जाती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार जब ज्यादा तापमान और ज्यादा नमी एक साथ मिलते हैं, तब गर्मी बेहद असहनीय महसूस होने लगती है। इसे “हीट इंडेक्स” कहा जाता है। कई बार वास्तविक तापमान से कहीं ज्यादा गर्मी महसूस होती है, जिससे लोगों को घुटन और बेचैनी का सामना करना पड़ता है।
भारत में इतनी ज्यादा गर्मी क्यों पड़ती है?
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की भौगोलिक स्थिति भी अत्यधिक गर्मी की बड़ी वजह है। उत्तर भारत का विशाल मैदानी इलाका कर्क रेखा के करीब स्थित है और तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है। इसकी वजह से गर्म हवाएं आसानी से बाहर नहीं निकल पातीं।
इसके अलावा मई और जून का समय प्री-मॉनसून पीरियड माना जाता है। इस दौरान मॉनसून अभी तक पूरी तरह नहीं पहुंचता, इसलिए गर्मी अपने चरम पर रहती है।
ग्लोबल वार्मिंग बना रही है स्थिति और गंभीर
IPCC और भारतीय मौसम विभाग की हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से भारत में हीटवेव की तीव्रता और अवधि दोनों बढ़ रही हैं। 2020 से 2025 के बीच हुए अध्ययनों में पाया गया कि एक्सट्रीम हीट इवेंट्स में 2 से 3 गुना तक बढ़ोतरी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में “अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट” भी गर्मी को बढ़ा रहा है। कंक्रीट की इमारतें, वाहन और एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्म हवा शहरों का तापमान आसपास के इलाकों की तुलना में 4 से 5 डिग्री तक बढ़ा देती है।
वैज्ञानिक शोध क्या बताते हैं?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और IMD की स्टडी के अनुसार मई और जून में सोलर रेडिएशन सबसे ज्यादा होता है। वहीं 2022 से 2025 के बीच हुई “वेट बल्ब टेंपरेचर” स्टडी में पाया गया कि 45 डिग्री तापमान और 50-60 प्रतिशत नमी की स्थिति में शरीर का तापमान नियंत्रित रखना बेहद मुश्किल हो जाता है।
NASA की अर्थ ऑब्जरवेटरी रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि 21 जून के आसपास Northern Hemisphere Summer Solstice के दौरान उत्तरी भारत में गर्मी अपने चरम पर पहुंच जाती है।
आखिर जिम्मेदार कौन?
वैज्ञानिकों के मुताबिक मई-जून की भीषण गर्मी मुख्य रूप से प्रकृति के मौसमी चक्र का हिस्सा है। सूर्य की स्थिति, पृथ्वी का झुकाव और मॉनसून से पहले का सूखा मौसम इसके प्रमुख कारण हैं। हालांकि ग्लोबल वार्मिंग इस स्थिति को और ज्यादा खतरनाक बना रही है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में 45 से 50 डिग्री तापमान वाली हीटवेव सामान्य स्थिति बन सकती है।
