पश्चिम बंगाल की राजनीति बुधवार को उस समय अचानक गरम हो गई जब हुमायूं कबीर ने बकरीद को लेकर एक बेहद विवादास्पद बयान दिया। उन्होंने साफ कहा कि आगामी बकरीद पर धार्मिक परंपरा के अनुसार कुर्बानी होकर रहेगी चाहे गाय हो, बकरा हो या ऊंट और इसे कोई नहीं रोक सकता।कबीर ने अपने बयान में चेतावनी भरे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि धार्मिक रिवाजों में हस्तक्षेप न किया जाए, क्योंकि कुर्बानी सदियों से चली आ रही परंपरा है और इसे रोकने का प्रयास आग से खेलने जैसा होगा।


कबीर का यह बयान सीधे तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी को चुनौती देता हुआ माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वाकई कुर्बानी को रोकना चाहती है, तो पहले पूरे राज्य में मौजूद सभी स्लॉटर हाउस बंद करे, वरना किसी भी तरह का प्रतिबंध जमीनी स्तर पर लागू ही नहीं हो सकेगा।बयान सामने आते ही बंगाल की सियासत में हलचल तेज हो गई। विपक्ष ने इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बताकर हमला बोला, वहीं कबीर समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने सिर्फ धार्मिक अधिकार और संवैधानिक स्वतंत्रता की बात रखी है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर व्यापक बहस छिड़ गई है, जहां लोग इसे राजनीतिक एजेंडा, धार्मिक परंपरा और कानून तीनों के संदर्भ में देख रहे हैं।


यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब राज्य में गोवंश की कुर्बानी से जुड़े नियमों, नोटिफिकेशनों और सरकारी प्रतिबंधों पर पहले से ही चर्चा चल रही है। कई जगह स्थानीय प्रशासन की ओर से निर्देश जारी किए गए थे, जिनका विरोध भी हुआ। अब कबीर के बयान ने पूरे मुद्दे को फिर से राजनीतिक केंद्र में ला दिया है।कुल मिलाकर, हुमायूं कबीर का यह बयान सिर्फ एक धार्मिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत माना जा रहा है और आने वाले दिनों में यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में और ज्यादा गर्माहट ला सकता है।