नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण पिछले कई महीनों से महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। राज्य सरकार ने हवाई अड्डे का नाम बदलकर उसे डी. बी. पाटिल के नाम पर रखने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद कई संगठनों और समुदायों ने इसके समर्थन और विरोध में लगातार प्रदर्शन किए। इन प्रदर्शनों में सड़कें रोके जाने, सरकारी दफ्तरों के बाहर भीड़ जुटने और यातायात बाधित होने की शिकायतें भी सामने आयीं। इसी वजह से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया जहाँ प्रदर्शन के अधिकार, नागरिकों की परेशानियों और राज्य की नीति संबंधी सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी हुई।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत वर्मा ने स्पष्ट संदेश दिया प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन इसे ऐसे न किया जाए जिससे आम लोगों की जिंदगी प्रभावित हो। कोर्ट ने कहा कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है, और शांतिपूर्ण तरीकों से अपनी आवाज उठाना ही लोकतांत्रिक समाज की सही राह है।


सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत वर्मा ने कहा कि हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है, लेकिन सड़कों पर उतरकर लोगों को परेशानी न दें।यह टिप्पणी महाराष्ट्र सरकार के नाम बदलने के प्रस्ताव से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान आयी। प्रस्ताव के अनुसार एयरपोर्ट का नाम ‘लोकनेता डी. बी. पाटिल नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा’ रखा जाना था।


राज्य सरकार द्वारा प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद राजनीतिक संगठनों की ओर से समर्थन व विरोध में लगातार प्रदर्शन होते रहे।सुनवाई इन्हीं प्रदर्शनों और नीति संबंधी सवालों की वजह से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची।


सुनवाई कर रही बेंच में शामिल थे।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत वर्मा जस्टिस जयमालया बागची जस्टिस विपुल एम पंचोली याचिका ‘प्रकाशजोत सामाजिक संस्था’ की ओर से दाखिल की गई थी।लेकिन बेंच ने कहा यह नीति निर्माण में हस्तक्षेप होगा। कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि किसी हवाई अड्डे का नाम क्या होना चाहिए।इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारियों के पास जाने की सलाह दी।


कोर्ट का संदेश साफ है लोकतंत्र में विरोध जताना अधिकार है, लेकिन इसे उस सीमा में रहकर किया जाना चाहिए जहाँ आम लोगों की जिंदगी प्रभावित न हो।और नामकरण जैसे फैसले नीति क्षेत्र का विषय हैं, जिन्हें सरकार को ही तय करना चाहिए।