जम्मू-कश्मीर के शोपियां स्थित दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम को गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत गैर-कानूनी संस्था घोषित किए जाने के बाद घाटी की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। यह मामला अब सिर्फ एक मदरसे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुरक्षा, शिक्षा और सियासत के बड़े मुद्दे में बदल गया है।


क्या है पूरा मामला?

प्रशासन ने शोपियां के इस मदरसे पर कार्रवाई करते हुए इसे गैर-कानूनी संस्था घोषित किया है। बताया जा रहा है कि जांच एजेंसियों को इसके कथित तौर पर जमात-ए-इस्लामी से जुड़े होने की आशंका थी। इसी आधार पर जांच हुई और फिर कार्रवाई की गई। हालांकि प्रशासन की तरफ से अब तक यह साफ नहीं किया गया है कि किन ठोस कारणों के आधार पर यह फैसला लिया गया।


महबूबा मुफ्ती ने क्यों जताई नाराजगी?

पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस फैसले को “घोर अन्याय” बताया है। उनका कहना है कि ऐसे फैसलों का सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर वर्गों पर पड़ता है। कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए ऐसे संस्थानों पर निर्भर रहते हैं। उन्होंने सरकार से फैसले पर दोबारा विचार करने की अपील की है।


सज्जाद लोन ने भी उठाए सवाल

पीपुल्स कॉन्फ्रेंस प्रमुख सज्जाद लोन ने भी इस कार्रवाई को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि कानूनों का इस्तेमाल सिर्फ कमजोर लोगों के खिलाफ किया जा रहा है। उनके मुताबिक चुनिंदा संस्थानों को निशाना बनाना सही तरीका नहीं है।


नेशनल कॉन्फ्रेंस ने किया पलटवार

इस पूरे विवाद में सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पीडीपी पर ही हमला बोला। पार्टी के वरिष्ठ नेता चौधरी मोहम्मद रमजान ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में यूएपीए लागू कराने वाली सरकार खुद पीडीपी थी और अब वही इसके इस्तेमाल पर सवाल उठा रही है।


मदरसा प्रबंधन ने क्या कहा?

मदरसे के चेयरमैन मोहम्मद शफी लोन ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि संस्थान का किसी भी प्रतिबंधित संगठन से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने दावा किया कि यह संस्थान जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन और कश्मीर विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त है और प्रशासनिक जांच में पूरा सहयोग किया गया था।


संपत्ति को लेकर भी दावा

मदरसा प्रबंधन का कहना है कि जिस जमीन पर संस्थान चल रहा है, वह एक सूफी संत गुल मोहम्मद सोफी की है और इसका किसी प्रतिबंधित संगठन से कोई लेना-देना नहीं है।


छात्रों पर क्या असर पड़ेगा?

इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ी चिंता वहां पढ़ रहे छात्रों और काम कर रहे शिक्षकों को लेकर है। अगर संस्थान लंबे समय तक बंद रहता है तो पढ़ाई बाधित हो सकती है और कई लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।


आगे क्या?

अब यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर आगे बढ़ सकता है। अगर मदरसा प्रबंधन अदालत का रुख करता है तो यह विवाद और गहरा सकता है। फिलहाल शोपियां का यह मामला घाटी में सुरक्षा और सामाजिक संतुलन की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।