नई दिल्ली।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जहां असंभव को संभव बना दिया है, वहीं कुछ तकनीकें ऐसे जटिल सवाल भी खड़े कर रही हैं जिनका जवाब सिर्फ मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि कानून और नैतिकता के दायरे में तलाशना पड़ता है। ऐसा ही एक मामला हाल ही में सामने आया, जब कोमा में पड़े एक सैनिक की पत्नी ने IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के जरिए मां बनने की इच्छा जताई। इस संवेदनशील मुद्दे पर दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला अब चर्चा का केंद्र बन गया है।
मामला एक ऐसे सैनिक से जुड़ा है, जो गंभीर हालत में कोमा में है और लंबे समय से अस्पताल में भर्ती है। उसकी पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए यह अनुमति मांगी कि वह अपने पति के स्पर्म का उपयोग कर IVF प्रक्रिया के जरिए बच्चा पैदा कर सके। यह मांग सुनने में जितनी भावनात्मक लगती है, उतनी ही कानूनी और नैतिक रूप से जटिल भी है।
कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या किसी ऐसे व्यक्ति से, जो अपनी इच्छा व्यक्त करने की स्थिति में नहीं है, इस तरह की प्रक्रिया के लिए स्पर्म लिया जा सकता है? सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति की सहमति (consent) इस तरह के मामलों में सर्वोपरि होती है। यदि मरीज ने पहले से, जब वह होश में था, ऐसी किसी प्रक्रिया के लिए अपनी सहमति दी हो, तभी इसे वैध माना जा सकता है।
मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, कोमा में मरीज से स्पर्म निकालना तकनीकी रूप से संभव है। इसके लिए Electroejaculation या Testicular Sperm Extraction (TESE) जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है, जिनके जरिए शरीर से सीधे स्पर्म प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया जितनी वैज्ञानिक है, उतनी ही संवेदनशील भी, क्योंकि इसमें मरीज की शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का प्रश्न जुड़ा होता है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि केवल पत्नी की इच्छा के आधार पर इस तरह की अनुमति नहीं दी जा सकती। मरीज के अधिकार, उसकी पूर्व इच्छा और उसकी गरिमा को प्राथमिकता देना आवश्यक है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि स्पष्ट सहमति उपलब्ध नहीं है, तो ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप और सावधानी जरूरी हो जाती है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब भारत में सहायक प्रजनन तकनीकों (ART) को लेकर कानून विकसित हो रहे हैं, लेकिन अभी भी कई ग्रे एरिया मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में अदालतों और परिवारों को असमंजस की स्थिति का सामना न करना पड़े।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ क्या हमारे कानूनी और नैतिक ढांचे भी उतनी ही तेजी से विकसित हो रहे हैं? कोमा में पड़े मरीज से स्पर्म लेकर IVF करना भले ही संभव हो, लेकिन यह निर्णय केवल विज्ञान का नहीं, बल्कि संवेदनशील मानवीय मूल्यों और कानून के संतुलन का विषय है।
दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य में ऐसे मामलों में जल्दबाजी नहीं, बल्कि गहन विचार, स्पष्ट सहमति और कानूनी प्रक्रिया को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
