
महताब नोमानी:
संयुक्त राष्ट्र की जारी नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में अब बचपन दुनिया के कई देशों के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित है। रिपोर्ट में भारत के प्रयासों की सराहना की गई है। भारत ने सही योजनाओं, मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली और लगातार प्रयासों के जरिए साबित किया है कि बाल मृत्यु दर को कम करके बच्चों का भविष्य सुरक्षित बनाया जा सकता है।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के अनुसार, एक वर्ष की आयु से पहले मरने वाले शिशुओं की संख्या में भारी गिरावट आई है। यह आंकड़ा 2015 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 37 मौतों से घटकर 2024 में 24 पर पहुंच गया है।
हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी हर 42 शिशुओं में से एक शिशु अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले ही दम तोड़ देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 37 में से एक है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 59 में से एक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में बढ़ोतरी से शिशु मृत्यु दर कम हुई है। वर्ष 2019 में जहां अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले प्रसव 83% से कम थे, वहीं 2024 में यह आंकड़ा 95% से अधिक पहुंच गया है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केवल अस्पताल में बच्चे का जन्म करवा देना ही समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि जन्म के बाद नवजात की देखभाल भी उतनी ही जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में शिशुओं के मरने की संख्या सबसे ज्यादा
छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति में दिखाई दे रहा है। यहां शिशु मृत्यु दर 36 प्रति 1000 जीवित जन्म दर्ज की गई है, जो देश में सबसे अधिक है। इसके बाद उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का स्थान रहा, जहां यह आंकड़ा 35 प्रति 1000 जीवित जन्म रहा।
गोवा और सिक्किम में शिशु मृत्यु दर सबसे कम
गोवा और सिक्किम देश में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य बने हैं। यहां शिशु मृत्यु दर क्रमशः 7 और 8 प्रति 1000 जीवित जन्म दर्ज की गई है।
केरल का भी बेहतर प्रदर्शन रहा, जहां यह दर 8 प्रति 1000 जीवित जन्म रही। वहीं त्रिपुरा में 12, महाराष्ट्र में 14 और आंध्र प्रदेश में 18 प्रति 1000 जीवित जन्म की दर दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन को दर्शाती है।
अब भी नवजात मृत्यु दर सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती अब भी नवजात शिशुओं की मौत है। भारत में शिशु मृत्यु दर में गिरावट के बावजूद नवजात मृत्यु दर एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में होने वाली कुल शिशु मौतों में करीब 73% मौतें जन्म के बाद पहले 28 दिनों के भीतर हुईं, जबकि 2014 में यह आंकड़ा 67.6% था।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में मृत्यु दर को और कम करने के लिए गर्भावस्था के दौरान बेहतर देखभाल, मां के लिए पौष्टिक आहार और जन्म के बाद बेहतर चिकित्सा सेवाओं पर विशेष ध्यान देना होगा।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में असमानताएं
असम में सबसे बड़ा ग्रामीण-शहरी अंतर दर्ज किया गया, जहां ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर 31 प्रति 1000 जीवित जन्म थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 14 प्रति 1000 जीवित जन्म रही।
बिहार में पुरुष शिशुओं की मृत्यु दर 21 प्रति 1000 जीवित जन्म दर्ज की गई, जबकि महिला शिशुओं की मृत्यु दर 25 प्रति 1000 जीवित जन्म रही। यह अंतर लैंगिक असमानता की ओर भी संकेत करता है।
