पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उनके साथ TMC के 59 विधायक हैं। इस दावे ने ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी की एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र के उस बड़े राजनीतिक संकट से की जा रही है, जब एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन से शिवसेना में बगावत कर दी थी। बाद में शिंदे गुट ने न केवल पार्टी पर दावा किया, बल्कि चुनाव आयोग से पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी हासिल कर लिया था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर TMC में भी बड़ी टूट होती है, तो क्या ममता बनर्जी की पार्टी के साथ भी ऐसा हो सकता है?


क्या है पूरा मामला?

हाल ही में TMC ने विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया था। इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि पार्टी के 80 विधायकों में से 59 विधायक उनके समर्थन में हैं।

उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर बदलाव की मांग भी की है। बागी गुट का कहना है कि उन्हें विधायक दल का बहुमत प्राप्त है और इसलिए विधानसभा में नेतृत्व बदलना चाहिए।

यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह TMC के लिए बड़ा झटका माना जाएगा। क्योंकि 59 विधायकों का समर्थन पार्टी के कुल विधायकों के दो-तिहाई से भी अधिक है।


क्या कहता है दल-बदल कानून?

भारत में राजनीतिक दलों की टूट और विधायकों की खरीद-फरोख्त को रोकने के लिए 1985 में दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) लागू किया गया था।

इस कानून के तहत यदि कोई विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है, पार्टी के खिलाफ मतदान करता है या पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है।

हालांकि कानून में एक महत्वपूर्ण प्रावधान भी है। यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक एक साथ अलग हो जाते हैं, तो इसे वैध विभाजन माना जाता है। ऐसी स्थिति में उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होती।

यानी अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक विधायक अलग गुट बना लें, तो वे नई पार्टी बना सकते हैं या किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं।


TMC के मामले में दो-तिहाई का गणित

पश्चिम बंगाल विधानसभा में TMC के कुल 80 विधायक हैं। दो-तिहाई संख्या लगभग 53 होती है।

ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि उनके साथ 59 विधायक हैं। यदि यह संख्या सही साबित होती है, तो बागी विधायक दल-बदल कानून से बच सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी सदस्यता पर खतरा नहीं होगा और वे अलग राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीर माना जा रहा है।


क्या पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी छिन सकता है?

कई लोगों के मन में यह सवाल है कि क्या केवल दो-तिहाई विधायक होने से कोई गुट पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह अपने नाम कर सकता है?


इसका जवाब है—नहीं।

दो-तिहाई विधायकों का समर्थन दल-बदल कानून से बचाव के लिए जरूरी है, लेकिन पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास होता है।

यदि किसी पार्टी में आधिकारिक रूप से फूट पड़ती है और दोनों गुट पार्टी के नाम तथा चुनाव चिन्ह पर दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग मामले की सुनवाई करता है और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर फैसला देता है।


चुनाव आयोग किन बातों पर करता है फैसला?

चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के तहत चुनाव आयोग ऐसे मामलों का निपटारा करता है।

फैसला लेते समय आयोग कई पहलुओं पर विचार करता है—


1. किस गुट के पास अधिक जनप्रतिनिधि हैं?

आयोग यह देखता है कि पार्टी के कितने विधायक, सांसद और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि किस गुट के साथ हैं। जिस गुट के पास ज्यादा समर्थन होता है, उसे बढ़त मिल सकती है।


2. पार्टी के संविधान का पालन

चुनाव आयोग यह भी जांचता है कि पार्टी का संविधान क्या कहता है और कौन-सा गुट उसके अनुसार काम कर रहा है।


3. पार्टी की मूल विचारधारा

यदि कोई गुट यह साबित कर देता है कि वही पार्टी के मूल सिद्धांतों और विचारधारा का सही प्रतिनिधित्व कर रहा है, तो यह उसके पक्ष में महत्वपूर्ण तर्क बन सकता है।


4. वोट प्रतिशत और जनसमर्थन

कई मामलों में चुनाव आयोग यह भी देखता है कि किस गुट को अधिक जनसमर्थन प्राप्त है और निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसके पास ज्यादा वोटों का प्रतिनिधित्व है।


महाराष्ट्र में क्या हुआ था?

महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों के साथ शिवसेना से अलग होकर अपना गुट बनाया था। बाद में चुनाव आयोग ने विभिन्न तथ्यों की समीक्षा के बाद शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिया था।


यही कारण है कि बंगाल में चल रहे मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम की तुलना बार-बार महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट से की जा रही है।


आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी के 59 विधायकों वाले दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। TMC नेतृत्व भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है।

लेकिन यदि बड़ी संख्या में विधायक वास्तव में बागी गुट के साथ जाते हैं, तो इससे न केवल पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बदल सकता है, बल्कि भविष्य में पार्टी के संगठन, नेतृत्व, नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर भी कानूनी तथा राजनीतिक लड़ाई छिड़ सकती है।

ऐसे में आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पूरे देश की नजर रहने वाली है, क्योंकि यह विवाद राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम बन सकता है।