ere | Source: ereअहमदाबाद। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला के एक बयान ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। वाघेला ने आरक्षण के समर्थन में आयोजित एक जनसभा के दौरान पटेल, बनिया और ब्राह्मण समुदाय का जिक्र करते हुए कहा कि यदि इन समुदायों से आने वाले आरक्षण विरोधी लोग हाथ से मैला उठाने का काम करने के लिए तैयार हों, तो वह उन्हें 50 हजार रुपये महीने वेतन देने को तैयार हैं। उनके इस बयान पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

वाघेला ने यह टिप्पणी शुक्रवार को गांधी जयंती के अवसर पर नर्मदा जिले के आदिवासी बहुल सागबारा में आयोजित एक जनसभा में की। कार्यक्रम में वह आरक्षण के समर्थन में बोल रहे थे। इसी दौरान उन्होंने उन लोगों पर निशाना साधा जो आरक्षण व्यवस्था को समाप्त किए जाने की मांग या उसका विरोध करते हैं। उनके बयान के बाद गुजरात में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है।

‘पटेल, बनिया या ब्राह्मण हैं तो मैला उठाकर दिखाएं’

जनसभा में शंकरसिंह वाघेला ने आरक्षण के मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि आरक्षण किसी की कृपा से नहीं मिला है। उनके अनुसार, यह उन समुदायों द्वारा पीढ़ियों तक झेले गए कष्ट और संघर्ष का परिणाम है। इसी संदर्भ में उन्होंने आरक्षण का विरोध करने वालों को आदिवासी समुदायों की परिस्थितियों को समझने की चुनौती दी।

वाघेला ने कहा, “मैं आरक्षण विरोधी उन सभी लोगों से कहना चाहता हूं कि चाहे आप पटेल हों, बनिया हों या ब्राह्मण हों, अगर आप हाथ से मैला उठाने का काम करने को तैयार हैं, तो इन लोगों का मल-मूत्र साफ करने के लिए मैं आपको 50 हजार रुपये महीना वेतन दूंगा। अगर आप आदिवासी समुदायों की तरह की परिस्थितियों में रहें, तभी आपको उनकी वास्तविक स्थिति का एहसास होगा।”

वाघेला के इस बयान में उन्होंने सामाजिक परिस्थितियों और आरक्षण के ऐतिहासिक आधार का मुद्दा उठाने की कोशिश की। हालांकि, बयान में विशेष समुदायों का नाम लिए जाने के बाद यह राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है।

आरक्षण को लेकर वाघेला ने कही संघर्ष और अन्याय की बात

पूर्व मुख्यमंत्री ने आरक्षण को लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक अन्याय की भरपाई का एक माध्यम बताया। उनका कहना था कि आरक्षण किसी समुदाय या व्यक्ति पर की गई कृपा नहीं है, बल्कि लंबे समय तक झेली गई सामाजिक परिस्थितियों और संघर्ष से जुड़ा विषय है।

वाघेला ने इसी तर्क के आधार पर आरक्षण के विरोधियों को आदिवासी समुदायों के जीवन और परिस्थितियों को समझने की बात कही। उनका कहना था कि जब तक किसी व्यक्ति को स्वयं ऐसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता, तब तक वह दूसरे समुदाय के संघर्ष और कठिनाइयों को पूरी तरह महसूस नहीं कर सकता।

अलग भीलिस्तान के समर्थन की भी बात

कार्यक्रम के दौरान वाघेला ने अलग भीलिस्तान राज्य की मांग के प्रति भी अपना समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वह अलग भीलिस्तान बनाने के लिए आदिवासियों का पूरा समर्थन करेंगे। उन्होंने आदिवासी समुदाय को दुनिया में सबसे अधिक पीड़ित समुदायों में से एक बताते हुए कहा कि दिल्ली और गांधीनगर में बैठे लोग आरक्षण के दुश्मन हैं।

वाघेला की यह टिप्पणी भी उनके आरक्षण संबंधी भाषण का हिस्सा थी। जनसभा में उन्होंने आदिवासी समुदायों के अधिकारों और आरक्षण से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

भाजपा ने जताई आपत्ति, जातीय वैमनस्य का लगाया आरोप

वाघेला के बयान पर भारतीय जनता पार्टी की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। भाजपा नेता और पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में शामिल यज्ञेश दवे ने उनके बयान पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि समुदायों और जातियों के बीच वैमनस्य पैदा करना उचित नहीं है।

दवे ने वाघेला के बयान के उस हिस्से पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने हाथ से मैला उठाने के काम का उल्लेख किया था। भाजपा नेता के मुताबिक, जिस मैला ढोने की प्रथा का जिक्र वाघेला ने किया, वह देश में पहले ही समाप्त की जा चुकी है।

भाजपा नेता का दावा- मैला ढोने की प्रथा पहले ही खत्म की जा चुकी

यज्ञेश दवे ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि सरकारों ने इस दिशा में काम किया है कि इस समुदाय से जुड़े लोगों को सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिले और उन्हें न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि पिछली तथा मौजूदा सरकारों ने इस प्रथा को समाप्त करने और संबंधित समुदाय के लोगों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाए हैं।

इस तरह वाघेला के बयान को लेकर विवाद केवल आरक्षण के मुद्दे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें जातीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक सम्मान और ऐतिहासिक भेदभाव जैसे विषय भी चर्चा में आ गए हैं।

कांग्रेस में वापसी की अटकलों के बीच आया बयान

शंकरसिंह वाघेला का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब उनके एक बार फिर कांग्रेस में शामिल होने को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, मौजूदा विवाद का केंद्र उनके द्वारा आरक्षण और आदिवासी समुदायों को लेकर दिया गया भाषण है।

वाघेला गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं और राज्य की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। ऐसे में उनके बयान पर भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा में आ गया है।

आरक्षण, आदिवासी अधिकार और जातीय बयानबाजी पर बढ़ी चर्चा

वाघेला के बयान ने गुजरात में आरक्षण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ वाघेला ने आरक्षण को ऐतिहासिक संघर्ष और अन्याय की भरपाई से जोड़ते हुए आदिवासी समुदाय की परिस्थितियों को समझने की बात कही, वहीं भाजपा ने उनके बयान में समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने वाला हिस्सा होने का आरोप लगाया है।

विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वाघेला ने अपने भाषण में पटेल, बनिया और ब्राह्मण समुदाय का सीधे तौर पर उल्लेख किया। इसी वजह से भाजपा नेताओं ने उनके बयान को लेकर सार्वजनिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई है।

बयान के बाद गुजरात की राजनीति में तेज हुई बहस

शंकरसिंह वाघेला का 50 हजार रुपये महीने वाला बयान अब गुजरात के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। उनके समर्थक इसे आरक्षण और आदिवासी समुदायों की सामाजिक परिस्थितियों पर केंद्रित टिप्पणी के रूप में देख सकते हैं, जबकि भाजपा की ओर से इसे जातीय वैमनस्य से जोड़कर आपत्ति जताई गई है। दोनों पक्षों की प्रतिक्रियाओं के बीच यह मुद्दा सामाजिक न्याय, आरक्षण और राजनीतिक बयानबाजी के सवालों को सामने ला रहा है।