चरणजीत सिंह चन्नी की बैठक, पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व विवाद। | Source: Social media

चरणजीत सिंह चन्नी की बैठक, पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व विवाद।Source : Social media

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन उससे पहले ही कांग्रेस के अंदर नेतृत्व को लेकर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर समर्थकों और नेताओं की बड़ी बैठक ने पार्टी की अंदरूनी राजनीति को नई चर्चा दे दी है। बैठक में कई नेताओं ने साफ तौर पर मांग रखी कि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में लड़े और उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जाए। राजनीतिक जानकार इस पूरे घटनाक्रम की तुलना बिहार के जीतन राम मांझी और झारखंड के चंपई सोरेन के राजनीतिक सफर से कर रहे हैं, जिन्हें पहले परिस्थितियों में मुख्यमंत्री बनाया गया और बाद में उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई।

चन्नी के समर्थन में जुटे नेता, नेतृत्व बदलने की उठी मांग

मोरिंडा में आयोजित बैठक में बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान कुछ नेताओं ने मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को पद पर बनाए रखने पर असहमति जताई। उनका कहना था कि अगर कांग्रेस को 2027 का चुनाव मजबूती से लड़ना है तो चरणजीत सिंह चन्नी को पार्टी का चेहरा बनाया जाना चाहिए।

कैसे बने थे पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री?

साल 2021 में कांग्रेस के भीतर बढ़ते राजनीतिक विवाद के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद पार्टी ने दलित समुदाय से आने वाले वरिष्ठ नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री बने।

हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और आम आदमी पार्टी ने सरकार बना ली। इसके बावजूद चन्नी राजनीति में सक्रिय रहे और 2024 के लोकसभा चुनाव में जालंधर से सांसद चुने गए।

अब क्यों बढ़ रही है नाराजगी?

हाल ही में कांग्रेस ने पंजाब संगठन में बदलाव करते हुए अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा, जबकि चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद चन्नी समर्थकों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करनी शुरू कर दी। उनका मानना है कि पार्टी की चुनावी रणनीति और संगठन दोनों की कमान चन्नी के हाथ में होनी चाहिए।

फिलहाल चन्नी ने पार्टी छोड़ने जैसा कोई संकेत नहीं दिया है, लेकिन समर्थकों की सक्रियता को कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है।

जीतन राम मांझी का उदाहरण क्यों दिया जा रहा है?

बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जेडीयू की हार के चलते नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने महादलित नेता जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। शुरुआत में माना गया कि वे अंतरिम मुख्यमंत्री होंगे, लेकिन बाद में उन्होंने स्वतंत्र फैसले लेने शुरू किए। पार्टी से मतभेद बढ़ने पर मांझी ने जेडीयू छोड़कर अपनी पार्टी बनाई और बाद में एनडीए का हिस्सा बन गए।

चंपई सोरेन का मामला भी रहा अलग

झारखंड में 2024 में हेमंत सोरेन के इस्तीफे के बाद चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया गया था। कुछ महीने बाद हेमंत सोरेन की वापसी हुई तो चंपई सोरेन ने नाराजगी जताई। बाद में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया और अपनी अलग राजनीतिक राह चुन ली।

क्या पंजाब में भी बदल सकते हैं राजनीतिक समीकरण?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तीनों नेताओं चरणजीत सिंह चन्नी, जीतन राम मांझी और चंपई सोरेन के राजनीतिक सफर में एक समानता दिखती है। तीनों को ऐसे समय मुख्यमंत्री बनाया गया, जब उनकी पार्टियां राजनीतिक संकट से गुजर रही थीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान और जनाधार भी मजबूत हुआ।हालांकि अभी तक चरणजीत सिंह चन्नी ने कांग्रेस छोड़ने या अलग राह अपनाने का कोई संकेत नहीं दिया है। लेकिन उनके समर्थकों की ओर से नेतृत्व परिवर्तन की खुली मांग यह जरूर बताती है कि पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान बढ़ रही है।2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती पंजाब इकाई में संतुलन बनाए रखने की होगी। यदि असंतोष बढ़ता है तो इसका असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। वहीं अगर पार्टी चन्नी की भूमिका को और मजबूत करती है तो पंजाब की राजनीति में नए समीकरण भी देखने को मिल सकते हैं।