
पिपरा कोठी किसान आंदोलन को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते सांसद सुधारकर सिंह।Source : Kalamlok
पूर्वी चंपारण के पिपरा कोठी में किसानों की जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक टकराव में बदल गया है। किसान सभा में शामिल होने के बाद एक सांसद समेत 24 लोगों पर हत्या की कोशिश, लूट, सरकारी काम में बाधा और अन्य गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। अब सांसद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बिहार सरकार, जिला प्रशासन और स्थानीय सांसद पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
किसान सभा के बाद दर्ज हुई FIR
सांसद सुधारकर सिंह ने बताया कि 3 जुलाई को वे अपने समर्थकों और किसान नेताओं के साथ पिपरा कोठी पहुंचे थे, जहां किसानों की जमीन पर बनाए जा रहे प्रस्तावित कृत्रिम वाटर पार्क के विरोध में सभा आयोजित की गई थी। सभा के बाद उन्होंने सांकेतिक विरोध के तौर पर किसानों की जमीन पर ट्रैक्टर भी चलाया।उनका आरोप है कि इसी कार्यक्रम के बाद जिला प्रशासन की ओर से उनके, शाश्वत गौतम, सुबोध यादव, रवीन्द्र सहनी, शमशाद आलम समेत कुल 24 लोगों के खिलाफ हत्या की कोशिश, लूटपाट, सरकारी कार्य में बाधा और 35 हजार रुपये की पॉकेटमारी जैसे गंभीर आरोपों में मामला दर्ज कराया गया।
एक घंटे तक बिना मजिस्ट्रेट के रोके रखा गया
सांसद सुधारकर सिंह का दावा है कि सभा स्थल पर उन्हें करीब एक घंटे तक पुलिस ने रोककर रखा, लेकिन वहां कोई मजिस्ट्रेट मौजूद नहीं था। उनका कहना है कि बार-बार मांग करने के बावजूद मजिस्ट्रेट को नहीं बुलाया गया, जो कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
घटनाक्रम का पूरा ब्यौरा भी दिया
प्रेस विज्ञप्ति में सांसद ने कहा कि सुबह करीब 10 बजे वे सभा स्थल पहुंचे, किसानों को संबोधित किया और दोपहर करीब 12:30 बजे सांकेतिक विरोध के रूप में ट्रैक्टर चलाया। उस समय मौके पर एसडीपीओ, थानाध्यक्ष, बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी, मीडिया और स्थानीय लोग मौजूद थे।इसके बाद वे दोपहर करीब 3 बजे जिलाधिकारी से मिले और किसानों की ओर से ज्ञापन सौंपा। शाम करीब 4:30 बजे उन्होंने सर्किट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की।
सरकार से पूछे सात बड़े सवाल
सांसद ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से कई सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि अगर उनके सामने पुलिस की मौजूदगी में लूट और पॉकेटमारी हुई थी तो उन्हें उसी समय गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया।उन्होंने यह भी पूछा कि यदि सरकारी कार्य में बाधा पहुंची थी तो शिकायत किसी सरकारी अधिकारी की जगह निजी व्यक्ति से क्यों दर्ज कराई गई। सांसद ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अब जनप्रतिनिधियों को किसानों और आम लोगों के मुद्दे उठाने पर फर्जी मुकदमों में फंसाया जाएगा।
जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी देने को भी तैयार
सुधारकर सिंह ने कहा कि अगर सरकार को लगता है कि उनके खिलाफ दर्ज आरोप सही हैं तो वे गिरफ्तारी देने के लिए भी तैयार हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल उनका नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और किसानों की आवाज उठाने से जुड़ा है।
95 साल पुरानी जमाबंदी रद्द करने का आरोप
सांसद सुधारकर सिंह का दावा है कि जिस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, उस पर किसानों का करीब 95 वर्षों से शांतिपूर्ण कब्जा है। उनके मुताबिक, इस जमीन की पहली जमाबंदी वर्ष 1931-32 में हुई थी और बाद में 1961 में वैध प्रक्रिया के तहत वर्तमान भूधारकों के पूर्वजों के नाम जमाबंदी दर्ज की गई। उनका कहना है कि किसान वर्षों से नियमित रूप से सरकारी लगान भी जमा करते आ रहे हैं।सांसद ने आरोप लगाया कि सरकार ने महज तीन महीने के भीतर किसानों की जमाबंदी रद्द कर उसी जमीन पर कृत्रिम वाटर पार्क बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिसका किसान लगातार विरोध कर रहे हैं।
मोती झील और सेंट्रल यूनिवर्सिटी का भी किया जिक्र
सांसद ने सवाल उठाया कि जब मोतिहारी में पहले से करीब 400 एकड़ में फैली मोती झील मौजूद है और 2016 में स्थापित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय को आज तक स्थायी परिसर के लिए जमीन नहीं मिल सकी, तब किसानों की खेती वाली जमीन पर वाटर पार्क बनाने की क्या जरूरत है।
स्थानीय सांसद पर भी लगाए आरोप
सांसद सुधारकर सिंह ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में स्थानीय सांसद राधा मोहन सिंह की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि किसानों की जमीन हड़पने की कोशिश की जा रही है और केंद्र तथा बिहार सरकार से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल जिला प्रशासन की ओर से सांसद के इन आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। दूसरी ओर, मामले की एफआईआर पहले से दर्ज है और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है। ऐसे में अब इस पूरे विवाद पर प्रशासनिक जांच और सरकारी पक्ष पर सभी की नजर बनी हुई है।
