धनबाद। कोयला खदानों से घिरे धनबाद जिले में जहां आर्थिक, सामाजिक और भाषाई चुनौतियां बच्चों की पढ़ाई के रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई थीं, वहीं एक सरकारी शिक्षिका ने शिक्षा को बदलाव का माध्यम बनाया। बरमसिया स्थित सरकारी मिडिल स्कूल की प्रधानाध्यापिका मुनमुन भट्टाचार्जी को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया गया है। देशभर से चयनित 48 शिक्षकों में मुनमुन भट्टाचार्जी भी शामिल हैं।
खनन क्षेत्र के बच्चों के बीच शिक्षा की नई पहल
मुनमुन भट्टाचार्जी ने स्कूल से जुड़ने के बाद विशेष रूप से खनन समुदाय से आने वाले बच्चों के सीखने के स्तर और शैक्षणिक परिणामों को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बच्चों की सामाजिक, भाषाई और आर्थिक परिस्थितियों को समझते हुए पढ़ाई को केवल पाठ्यपुस्तकों और कक्षा तक सीमित नहीं रखा।
उनकी कोशिश रही कि बच्चों को उनकी पारिवारिक या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण शिक्षा से पीछे न रहना पड़े। इसी सोच के तहत स्कूल में ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया, जिनसे बच्चों में सीखने के साथ आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना भी विकसित हो सके।
स्कूल में पढ़ते हैं 300 से अधिक बच्चे
बरमसिया के सरकारी मिडिल स्कूल में कक्षा 1 से 8 तक 300 से अधिक विद्यार्थी पढ़ते हैं। इनमें लगभग 60 से 70 प्रतिशत बच्चे खनन से जुड़े परिवारों से आते हैं। इन परिवारों के बच्चों के सामने आर्थिक कठिनाइयों के अलावा सामाजिक और भाषाई चुनौतियां भी थीं।
मुनमुन भट्टाचार्जी ने इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षण गतिविधियों को विकसित किया। उनका प्रयास रहा कि बच्चों की सीखने की गति और उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों में सुधार हो तथा हर बच्चे को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिले।
कम लागत वाले शिक्षण उपकरणों से मजबूत की बुनियादी शिक्षा
मुनमुन भट्टाचार्जी की पहल में फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी (एफएलएन) को मजबूत करने के लिए कम लागत वाले शिक्षण उपकरणों का इस्तेमाल भी शामिल रहा। इसका उद्देश्य बच्चों की बुनियादी पढ़ने, लिखने और गणितीय समझ को बेहतर बनाना था।
इसके साथ ही उन्होंने कला-एकीकृत शिक्षण को भी पढ़ाई का हिस्सा बनाया। इससे बच्चों को पारंपरिक तरीके से अलग अनुभव आधारित तरीके से सीखने का अवसर मिला। शिक्षा को अधिक प्रभावी और बच्चों के लिए रुचिकर बनाने के लिए विभिन्न गतिविधियों का इस्तेमाल किया गया।
नई शिक्षा नीति और निपुण भारत से जुड़ा प्रयास
उनकी पहल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और निपुण भारत से जुड़े लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया गया। पढ़ाई के साथ व्यावहारिक और व्यावसायिक अनुभव को भी महत्व दिया गया।
प्रैक्टिकल प्रोफेशनल एक्सपीरियंस को शिक्षा का हिस्सा बनाने का उद्देश्य बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देने के बजाय उन्हें व्यावहारिक कौशल से भी जोड़ना रहा। इस प्रयास के माध्यम से विद्यार्थियों में आगे चलकर आत्मनिर्भर बनने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया गया।
विशेष जरूरतों वाले बच्चों को भी मिला बराबर अवसर
मुनमुन भट्टाचार्जी ने विशेष जरूरतों वाले बच्चों और भाषा संबंधी बाधाओं का सामना करने वाले विद्यार्थियों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया। उनकी सोच रही कि किसी बच्चे को उसकी सामाजिक या व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के आधार पर शिक्षा के अवसरों से वंचित नहीं होना चाहिए।
इसी दृष्टिकोण के तहत अलग-अलग जरूरतों वाले बच्चों को साथ लेकर चलने और उन्हें सीखने के समान अवसर उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करना नहीं, बल्कि बच्चों की समझ, आत्मविश्वास और समग्र विकास को मजबूत करना भी रहा।
कला से लेकर एनईईटी की तैयारी तक बच्चों ने बनाई पहचान
मुनमुन भट्टाचार्जी की पहल का असर विद्यार्थियों की उपलब्धियों में भी दिखाई दिया। वंचित और खनन समुदाय से आने वाले कुछ बच्चों ने राज्य स्तर पर कला के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। वहीं कुछ विद्यार्थी मेडिकल प्रवेश परीक्षा एनईईटी जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी की दिशा में आगे बढ़े।
इसके अलावा व्यावसायिक प्रशिक्षण से जुड़े प्रयासों ने कुछ विद्यार्थियों में आत्मनिर्भर बनने और अपना काम शुरू करने की क्षमता विकसित करने में मदद की। इस तरह स्कूल में शिक्षा का दायरा केवल नियमित पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहा।
शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाने पर जोर
मुनमुन भट्टाचार्जी के प्रयासों का केंद्रीय उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बदलाव लाना रहा। उनका मानना है कि जिन बच्चों को सामाजिक, आर्थिक या भाषाई परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए अलग तरीके अपनाने की जरूरत होती है।
उन्होंने बच्चों की परिस्थितियों को समझते हुए सीखने के अवसरों को अधिक समावेशी बनाने की कोशिश की। इसी वजह से उनकी पहल में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान के साथ कला, कौशल और व्यावहारिक अनुभव को भी जगह मिली।
मुनमुन भट्टाचार्जी को राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान
शिक्षा के क्षेत्र में किए गए इन प्रयासों के लिए मुनमुन भट्टाचार्जी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चुना गया। 5 सितंबर 2026 को शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। देशभर से चयनित 48 शिक्षकों में उनका नाम शामिल होना उनके शैक्षणिक प्रयासों को मिली राष्ट्रीय पहचान को दर्शाता है।
उनका सम्मान ऐसे समय में हुआ है जब शिक्षा में समान अवसर, बुनियादी सीखने की क्षमता और कौशल विकास पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मुनमुन भट्टाचार्जी का काम यह दिखाता है कि संसाधन सीमित होने के बावजूद बच्चों की जरूरतों को समझकर शिक्षण प्रक्रिया में नए तरीके अपनाए जा सकते हैं।
‘कोई बच्चा अपनी पृष्ठभूमि के कारण पीछे न रहे’
मुनमुन भट्टाचार्जी के अनुसार, कई बच्चों को सामाजिक और भाषाई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना रहा है कि कोई भी बच्चा अपनी पृष्ठभूमि के कारण पीछे न रह जाए।
उनका मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को केवल अंकों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसमें लड़के और लड़कियों को समान अवसर देना, अलग-अलग जरूरतों वाले बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करना और उनकी समझ विकसित करना भी जरूरी है।
